#daduji
|| श्री दादूदयालवे नमः ||
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= २५ . सांख्य ज्ञांन को अंग =*
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*स्वासैं स्वास राति दिन सोहं सोहं होइ जाप,*
*याहि माला बार बार दिढकैं धरतु है ।*
*देह परै इन्द्री परै अंतहकरन परै,*
*एक ही अखण्ड जाप ताप कौ हरतु है ॥*
*काठ ही रुद्राक्ष की रु सूत हू की माला और,*
*इनकै फिरायै कौंन कारिज सरतु है ।*
*सुन्दर कहत ता तैं आतमा चेतनि रूप,*
*आपुकौ भजन सु तौ आपु ही करतु है ॥२२॥*
*उत्तम जपमाला* : श्वास प्रतिश्वास ‘सोऽहम्’ का जप रात दिन होता रहे - इसी जपमाला को दृढ़ता से धारण करना चाहिये ।
देह इन्द्रिय एवं अन्तःकरण से ऊपर यह एक मात्र अखण्ड जप त्रिविधि संताप को विनष्ट कर देता है ।
काष्ट, रुद्राक्ष या सूत की मालाएँ फेरने से कौन कार्य सम्पन्न होने वाला है ।
अतः *श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - क्योंकि यह चैतन्यमय आत्मा अपना भजन स्वयं ही करता है ॥२२॥
(क्रमशः)

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