शुक्रवार, 5 जून 2015

२५ . सांख्य ज्ञांन को अंग ~ २२



‪#‎daduji‬
|| श्री दादूदयालवे नमः ||
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
.
*= २५ . सांख्य ज्ञांन को अंग =*
*स्वासैं स्वास राति दिन सोहं सोहं होइ जाप,* 
*याहि माला बार बार दिढकैं धरतु है ।* 
*देह परै इन्द्री परै अंतहकरन परै,* 
*एक ही अखण्ड जाप ताप कौ हरतु है ॥* 
*काठ ही रुद्राक्ष की रु सूत हू की माला और,* 
*इनकै फिरायै कौंन कारिज सरतु है ।* 
*सुन्दर कहत ता तैं आतमा चेतनि रूप,* 
*आपुकौ भजन सु तौ आपु ही करतु है ॥२२॥* 
*उत्तम जपमाला* : श्वास प्रतिश्वास ‘सोऽहम्’ का जप रात दिन होता रहे - इसी जपमाला को दृढ़ता से धारण करना चाहिये । 
देह इन्द्रिय एवं अन्तःकरण से ऊपर यह एक मात्र अखण्ड जप त्रिविधि संताप को विनष्ट कर देता है । 
काष्ट, रुद्राक्ष या सूत की मालाएँ फेरने से कौन कार्य सम्पन्न होने वाला है । 
अतः *श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - क्योंकि यह चैतन्यमय आत्मा अपना भजन स्वयं ही करता है ॥२२॥ 
(क्रमशः)

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