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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-१)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= २१ वां विन्दु सीकरी सत्संग दिन ३ =*
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*= राजान्न से विघ्न =*
तब दादूजी ने कहा - मंत्रीप्रवर ! हम साधक लोग हैं, राजान्न नहीं खाना चाहते हैं । राजान्न से हमारे साधन में विघ्न होगा । राजान्न राजसी होता ही है । साधुओं को सात्त्विक अन्न ही खाना चाहिये । सो मधुकारी नामक भिक्षा संतों के लिये अमृत तुल्य मानी जाती है और संत लोग अनायास ले आते हैं । इसका विचार छोड़ दो ।
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अथवा कोई भक्त हमारी इच्छा के बिना भी ईश्वर प्रेरणा से अकस्मात् ले आय तो भी हम भगवान् का प्रसाद मानकर ले लेते हैं -
"अणवंछा आगे पड़े, पीछे लेय उठाय ।
दादू के शिर दोष यहु, जे कुछ राम रजाय ॥
अणबंछा आगे पड़े, खिरा विचार रु खाय ।
दादू फिरे न तोड़ता, तरुवर ताक न जाय ॥"
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जैसा भी भिक्षा में रुखा सुखा मिल जाय वही साधक के लिये अमृत तुल्य होता है । अधिक रसों के लिये साधक को लालायित नहीं होना चाहिये । रसना इन्द्रिय को जीते बिना अन्य इन्द्रियों को जीतना कठिन होता है - "पंचों का मुख मूल है, मुख का मनवा एक" अर्थात् पांचों ज्ञानेन्द्रियों को वश करने में रसना इन्द्रिय ही मूल है अर्थात् रसना जीत लेने पर अन्य चार अनायास जीती जा सकती है । और मुख के जीतने में एक मनका जीतना ही मूल कारण है अर्थात् मन जीत लेने पर मुख अर्थात् रसना अनायास जीती जा सकती है ।
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"दादू टूका सहज का, संतोषी जन खाय ।
मृतक भोजन गुरु मुखी, काहे कल्पे जाय ॥"
अर्थात अनायास प्राप्त भिक्षान्न ही संतोषी साधक संत पाकर भजन करते हैं । श्राद्धदिक मृतक के निमित्त का सुन्दर भोजन प्राप्त करने की कल्पना अपने मन में करके उसको पाने साधक संत नहीं जाते हैं । इसलिये सदोष अन्न का संतों ने त्याग ही किया है ।
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देखो ! सदोष अन्न के भोजन से स्वामी रामानन्दजी के भी भजन में विघ्न उपस्थित हो गया था, उसी से उन्होंने सेवा करने वाले ब्रह्मचारी को शाप दिया था, जिससे वह शरीर छोड़कर रैदास भक्तरूप में जन्मा था । यह कथा अति प्रसिद्ध ही है ।
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दादूजी के उक्त विचार सुनकर बीरबल अकबर बादशाह के पास आया और कहा - दादूजी तथा उनके शिष्य आदि राजान्न को खाना अच्छा नहीं मानते हैं, वे कहते हैं राजान्न प्रायः राजस और तामस होता है, कारण नाना प्रकार के करों से आता है । अतः हम लोग तो भिक्षान्न से ही प्रसन्न हैं ।
(क्रमशः)

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