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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-१)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= २१ वां विन्दु सीकरी सत्संग दिन ३ =*
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*= राजान्न से विघ्न =*
इधर नगर में जग्गाजी की उक्त शक्ति का समाचार शीघ्र ही फैल गया । सुनकर सब लोग आश्चर्य करते थे । फिर तो जग्गाजी जब नगर में भिक्षा को आते तो तब लोग उन्हें अति प्रेम से प्रणाम करते थे और अतिशीघ्र भिक्षा लाकर के देते थे ।
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फिर ईर्ष्या-वश तुलसी ब्राह्मण ने बादशाह को कहा - आप दादू को अपना भोजन कराना ही चाहते हैं तो ऐसा करिये, अपने यहां की सूखी सामग्री आमेर नरेश भगवतदास के यहाँ गुप्तरूप से पहुँचा दें किन्तु दादू आदि को इस बात का पता नहीं लगना चाहिये । फिर भगवतदास को आज्ञा दें कि वह उस सामग्री का भोजन बनाकर दादू को जिमादे ।
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ऐसा करने से दादू आपका भोजन जीम लेगा और आपकी इच्छा पूर्ण हो जायगी । बादशाह चाहता था कि कम से कम एक दिन भी ये संत लोग मेरे यहां का भोजन कर लें तो मेरा अवश्य कल्याण होगा । इससे तुलसी ब्राह्मण का परामर्श बादशाह को रुचिकर ज्ञात हुआ ।
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*आमेर नरेश द्वारा दादूजी को भोजन कराने का षड़यंत्र*
फिर बादशाह ने आमेर नरेश को बुलाकर तुलसी ब्राह्मण के कथनानुसार ही व्यवस्था कर दी । राजा को समझा दिया और सब भोजन सामग्री गुप्त रूप से भेज दी गई और कहा - केवल दादूजी को ही तुम किसी प्रकार से हमारी सामग्री से बनी हुआ भोजन जिमाओ । ये मेरे हित का कार्य तुम अवश्य करो ।
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राजा ने कहा - आपकी आज्ञा तो मुझे सर्वथा मान्य ही है किंतु वे किसी के वश में तो होते नहीं हैं, वे तो स्वतंत्र हैं फिर भी मैं आपकी आज्ञानुसार गुप्त रूप से पूर्ण प्रयत्न करूंगा किंतु मेरा अनेक बार का यह अनुभव भी है कि वे सर्वज्ञ हैं, मेरे इस कपट को जानकार मुझ पर रूष्ट हो गये तो मेरे पर विपत्ति का पर्वत अवश्य आ पड़ेगा परन्तु आपकी आज्ञा भी मुझे माननी ही हैं ।
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आगे जो ईश्वर की इच्छा होगी वही होगा । फिर राजा ने वह भोजन की सामग्री गुप्त रूप से अपने स्थान पर पहुँचा दी । फिर अकबर ने दादूजी को सत्संग के लिये बुलवाया ।
(क्रमशः)

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