मंगलवार, 22 सितंबर 2015

२९. ज्ञानी को अंग ~ १९

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*२९. ज्ञानी को अंग*
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*सुनत श्रवण मुख बोलत बचत घ्रान,*
*सूंघत फूलनि रूप देखत दृगन है ।*
*त्वक् सप्रसन रस रसना ग्रसन कर,*
*ग्रहत असन अरु चलत पगन है ॥*
*करत गवन पुनि बैठत भवन सेज,*
*सोवत रवन तन औढ़त नगन है ।*
*जो जो कछु बिवहार जानत सकल भ्रम,*
*सुन्दर कहत ज्ञानी गगन मगन है ॥१९॥*
*ज्ञानी ही नित्य समाधिस्थिति* : ज्ञानी कानों से सुनता है, मुख से बोलता है, नाक से फूलों को सूँघता है, नेत्रों से रूप को देखता है ।
त्वचा से स्प्रष्टव्य विषयों का स्पर्श करता है, रसना से स्वाद चखता है, भोजन करता है, तथा पैरों से चलता है ।
यात्राएँ करता है, सुन्दर भवनों में सुखदायक शय्याओं पर लेटता तथा सोता है । कभी सुन्दर वस्त्र पहनता है तो कभी उसे नग्न रहने में भी कोई आपत्ति नहीं ।
*श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - परन्तु वह ज्ञानी जो भी उपयुक्त लोकव्यवहार करता है उसे वास्तव में भ्रम मानता हुआ ही करता है । तथा नित्य समाधि की उच्चतम स्थिति में निरत रहता है१॥१९॥
(१. तु ०-बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्द्त्यात्मनि यत् सुखं ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥
- भ० गी०, अ ० ५, श्लोक २१ ।)
(क्रमशः)

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