मंगलवार, 22 सितंबर 2015

💐💐  ‪#‎daduji 💐💐
॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
३४५. साच निदान । राज मृगांक ताल ~
हरि बिन निहचल कहीं न देखूं, तीन लोक फिरि सोधा रे ।
जे दीसै सो विनश जायगा, ऐसा गुरु परमोधा रे ॥ टेक ॥ 
धरती गगन पवन अरु पानी, चंद सूर थिर नाँहीं रे ।
रैनि दिवस रहत नहिं दीसै, एक रहै कलि मांहीं रे ॥ १ ॥ 
पीर पैगम्बर शेख मुशायख, शिव विरंचि सब देवा रे ।
कलि आया सो कोई न रहसी, रहसी अलख अभेवा रे ॥ २ ॥ 
सवा लाख मेरु गिरि पर्वत, समंद न रहसी थीरा रे ।
नदी निवान कछू नहिं दीसै, रहसी अकल शरीरा रे ॥ ३ ॥ 
अविनाशी वह एक रहेगा, जिन यहु सब कुछ कीन्हा रे ।
दादू जाता सब जग देखूं, एक रहत सो चीन्हा रे ॥ ४ ॥ 
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव साच का निदान कर रहे हैं कि हे संतों ! इस संसार का कारण परब्रह्म, वही सत्य - स्वरूप निश्‍चल है । हमने व्यष्टि - समष्टि रूप त्रिलोकी में विचारपूर्वक यह देखा है । जो नाम रूप प्रपँच दीखता है, वह सब परिवर्तनशील है । सतगुरु का भी यही उपदेश है । धरती, गगन, पवन, पानी, चन्द्रमा, सूर्य, सभी अस्थिर हैं, समय पाकर सभी नष्ट हो जाएंगे । रात - दिन ये सामयिक कार्य भी कोई स्थिर रहने वाला नहीं है, इस संसार में इसका रचयिता एक सच्चिदानन्द स्वरूप अविनाशी परब्रह्म ही रहता है, उसका कभी परिवर्तन नहीं होता । पीर, पैगम्बर, शेख, मुशायख, शिव, ब्रह्मा, सम्पूर्ण देवगण, इस कलिकाल में जो भी उत्पन्न हुए हैं, वे कोई भी नहीं रहेंगे । समय पाकर सबके स्थूल नष्ट होने वाले हैं । 
एक सजातीय - विजातीय - स्वगत भेद रहित, अलख कहिए मन - वाणी का अविषय, सत् चित् आनन्द रूप ब्रह्म ही रहेगा । सुमेरु, द्रोणगिरि और अनेकों पहाड़, समुद्र आदि ये कोई भी स्थिर रहने वाले नहीं हैं । नदी हैं, कुएँ - बावड़ी हैं, ये कोई भी रहने वाले नहीं हैं । एक कला अवयव रहित अविनाशी परमेश्‍वर ही रहने वाले हैं । जिसने यह सब कुछ रचना रची है, वह अविनाशी ही रहेगा । मायिक कार्य, सम्पूर्ण आने - जाने वाला, हम देख रहे हैं । एक वह परमेश्‍वर माया का अधिष्ठान चैतन्य, वही सदैव रहता है । उसी को हमने ‘चीन्हा’ कहिए, जान लिया है

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें