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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-१)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= २१ वां विन्दु सीकरी सत्संग दिन ३ =*
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*= राजान्न से विघ्न =*
अकबर ने दादूजी को सत्संग के लिये बुलवाया । दादूजी के आने पर हाथ जोड़ कर तथा मस्तक नमाकार प्रणाम किया और उच्च आसन पर बैठा-कर आप भी बैठ गया और बोला-आप तुरक और हिन्दुओं की हद को छोड़कर अद्भुत मार्ग से चलते हैं, आप का इष्टदेव कौन है ?
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हिन्दुओं में- राम, कृष्ण, नृसिंह, विष्णु, शंकर, वेद, ब्रह्मा, शक्ति, सूर्य, गणेश, वरुणादि और कुछ लोग अर्हन्त को, कुछ बुद्ध को इष्टदेव मानते हैं, ऐसे अनेक इष्ट देव हैं । सब अपने २ इष्ट की महिमा गाते हैं, अपने २ को ही सबसे बड़ा बताते हैं । मुसलामानों में भी ऐसा ही है ।
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मुहम्मद आदि पैगम्बरों को ही खुदा मानते हैं । मुख्य सब का इष्टदेव कौन है यह ज्ञात नहीं होता है । आप पूर्ण सिद्ध पुरुष हैं, अतः पक्षपात रहित मेरे को उक्त प्रश्न का उत्तर देने की कृपा करैं, आपका इष्टदेव बतावें ?
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*निजी इष्टदेव का परिचय देना = दादूजी बोले*
*स्वर्ग भुवन पाताल मधि, आदि अंत सब सृष्टि ।*
*सिरज सबन को देत है, सोइ हमारा इष्ट ॥*
जो संपूर्ण भुवनों की आदि में अपनी सृजन शक्ति द्वारा रचना करता है और फिर अपनी रक्षक शक्ति द्वारा मध्य में रक्षा करता है, सब का भरण पोषण करता है और अंत में सबको अपनी मायारूप शक्ति में लीन कर लेता है वह परमेश्वर मेरा इष्टदेव है ।
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वह सर्व शिरोमणि है, उसके ऊपर कोई नहीं है । उसके स्वरूप का विचार करैं तब तो उसमें नामरूप का अभाव है, वह सब से परे है, सब से भिन्न है, उसी के प्रकाश से विश्व प्रकाशित होता है, वह आता जाता नहीं है, सर्वत्र एक रस व्यापक है । ज्ञानीजन उसका परब्रह्म तथा परमधाम रूप से परिचय देते हैं ।
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उसके उक्त स्वरूप को जो संशय विपर्यय रहित अपरोक्ष रूप से जान लेते हैं, वे इस जन्मादि मिथ्या संसार से मुक्त होकर उसी के स्वरूप में लीन हो जाते हैं । वह परब्रह्म ही मेरा इष्ट-देव है ।
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उक्त इष्टदेव का परिचय दादूजी के मुख कमल से सुनकर अकबर अति प्रसन्न होते हुआ बोला - भगवन् ! ऐसे इष्टदेव का परिचय मुझे किसी ने नहीं दिया है, सब अपनी २ हद्द की ही बातें कहते रहै हैं । आपने जो इष्टदेव बताया है, इस में हिन्दू-मुसलमान की कोई भी पक्षपात ज्ञात नहीं होती है ।
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आपको यह किसने बताया था, वह कौन ऐसा महापुरुष था, उसका भी कुछ परिचय दीजिये ? दादूजी ने कहा-मुझे अहमदाबाद के कांकरिया तालाब पर मेरे गुरु देव वृद्ध(ब्रह्म) भगवान् ने बताया था । इतना कहकर दादूजी ने कहा - हमारे जाने का समय हो गया, हम अपने आसन पर जाते हैं ।
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फिर सत्यराम बोलकर दादूजी उठ खड़े हुये । सबने श्रद्धा भक्तिपूर्वक प्रणाम किया । बादशाह ने प्रणाम करते हुये कहा - यहां विराजैं तब तक प्रतिदिन ही कृपा किया करैं । दादूजी ने कहा - तुम बुलाया करोगे तो हम आ जाया करेंगे । 'सत्यराम' ऐसा बोल करके कुछ अपने शिष्य तथा भक्तों के साथ बाग को पधार गये ।
इति श्री दादू चरितामृत सीकरी सत्संग तृतीय दिन बिन्दु २१ समाप्तः ।
(क्रमशः)

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