गुरुवार, 24 सितंबर 2015

२९. ज्ञानी को अंग ~ २०

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*सवैया ग्रन्थ(सुन्दर विलास)*
साभार ~ @महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य - श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व
राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*२९. ज्ञानी को अंग*
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*कर्म न विकर्म करै भाव न अभाव धरै,* 
*सुभ हु असुभ परे यातैं निधरक है ।* 
*बसती न सून्य जाकै पाप ही पुन्य ताकै,* 
*अधिक न न्यून वाकै स्वर्ग न नरक है ॥* 
*सुख दुख सम दोऊ नीच ही न ऊंच कोऊ,* 
*ऐसी बिधि रहै सोऊ मिल्यौ न फरक है ।* 
*एक ही न दोइ जानै बंध मोक्ष भ्रम मांनै,* 
*सुन्दर कहत ज्ञानी ज्ञान मैं गरक है२ ॥२०॥* 
(२. तु०-कायेन मनसा बुद्ध या केवलै रिन्द्रियैरपि । 
योगिन: कर्म संग त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥ 
- भ० गी०, अ० ५, श्लोक ११ ।) 
*ज्ञानी सतत आत्मज्ञान निरत* : ज्ञान की उस उच्चतम अवस्था में पहुँचने पर उस ज्ञानी के लिये, न कोई कर्म(कर्तव्य) रह जाता है, न कोई अकर्म(अकर्तव्य) न भावन अभाव । न कुछ शुभ रह जाता है, अशुभ; अतः वह निशंक(निधड़क) होकर लोकव्यवहार करता है । 
न उसके लिये मनुष्यों के वास का महत्त्व रह जाता है, न शून्य(एकान्त) का । न निवास की अधिकता या न्यूनता की उसको कोई अपेक्षा रह जाती है । न वह किसी पाप कर्म में प्रवृत होता है, न पुण्यकर्म में । उसके लिये स्वर्ग या नरक का भी कोई महत्त्व नहीं रह जाता । 
उस अवस्था में उसके लिये सुख या दुःख - दोनों ही समान होते हैं । न वह किसी को नीच समझता है न उच्च । वह किसी भी स्थित में रहे - उसके मन में कोई अन्तर नहीं आता ।
वह उस समय एक ब्रह्म को ही जानता है, द्वैत को उसके पास आने का साहस नहीं रह जाता । अतः *श्री सुन्दरदास जी* कहते हैं - ऐसा ज्ञानी निरन्तर आत्मज्ञान में निमग्न रहता है ॥२०॥
(क्रमशः)

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