शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

= विन्दु (१)४४ =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-१)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ४४ दिन २६ =*
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*= जीवन्मुक्ति एवं विदेह मुक्ति वर्णन =*
अब आगे कह रहे हैं कि जीवितावस्था में ही ज्ञानरूप साधन द्वारा मुक्ति होती है । मरने से मुक्ति हो जायगी ऐसा विश्वास नहीं करना चाहिये -
जीवित छूटे देह गुण, जीवित मुक्ता होय ।
जीवित काटे कर्म सब, मुक्त कहावे सोय ॥
जीवित ही दुस्तर तरे, जीवित लंघे पार ।
जीवित पाया जगद्गुरु, दादू ज्ञान विचार ॥
जीवित जगपति को मिले, जीवित आतम राम ।
जीवित दर्शन देखिये, दादू मन विश्राम ॥
जीवित पाया प्रेमरस, जीवित पीया अघाय ।
जीवित पाया स्वाद सुख, दादू रहे समाय ॥
जीवित भागे भरम सब, छूटे कर्म अनेक ।
जीवित मुक्त सद्गति भये, दादू दर्शन एक ॥
जीवितावस्था में ही जिसके स्थूल देह के व्यर्थ भ्रमणादि और सूक्ष्म देह के काम क्रोधादि गुण छूटते हैं और सर्व कर्म कटते हैं, तब वह मुक्त कहा जाता है । ज्ञानी जन जीवितावस्था में दुस्तर संसार सिन्धु को ज्ञान द्वारा तैर कर पार गये हैं और जीवितावस्था में ही ब्रह्मज्ञान का विचार करके जगद्गुरु ब्रह्म को प्राप्त किया है ।
जीवात्मा जीवितावस्था में ही जगत्-पति राम का दर्शन करके राम से अभेद भाव रूप से मिलता है, तब ही मन को विश्राम होता है । जिन्होंने जीवितावस्था में ही प्रभु के प्रेम-रस को प्राप्त किया है तथा उस रस के स्वाद का अनुभव करते हुये तृप्त होकर पान किया है वे नित्य सुख रूप ब्रह्म में ही समाकर रहे हैं, ब्रह्म से भिन्न अपने को नहीं मानते ।
एक अद्वैत ब्रह्म का आत्मस्वरूप से साक्षात्कार करने पर जीवितावस्था में ही मति से सब भ्रम भाग जाते हैं और जन्मांतरों के अनेक संचित कर्म भी नष्ट हो जाते हैं तथा जीवितावस्था में ही द्वन्द्वों से मुक्त होकर जिज्ञासु जीवन्मुक्ति को प्राप्त हो जाता है । 
उक्त स्थिति को प्राप्त होकर - दत्तात्रेय, कपिल, सनकादिक, नवयोगेश्वर, जड़भरत, गोरक्ष, गोपीचंद, भृर्तहरि, नामदेव, रैदास, कबीर आदि वैराग्य द्वारा गृहा-सक्ति और शोकमोहादि द्वन्द्वों को त्यागकर जीवन्मुक्त हो गये हैं ।
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फिर यह पद कहा -
"राम विमुख जग मर मर जाय, जीवें संत रहैं ल्यो लाय ॥टेक॥
लीन भये जे आतम रामा, सदा सजीवन कीये नामा ॥१॥
अमृत राम-रसायन पीया, तातैं अमर कबीरा कीया ॥२॥
राम राम कह राम समाना, जन रैदास मिले भगवाना ॥३॥
आदि अंत केते कलि जागे, अमर भये अविनाशी लागे ॥४॥
राम रसायन दादू माते, अविचल भये राम रँगराते ॥५॥
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द्वितीय पद -
निकट निरंजन लाग रहे, तब हम जीवित मुक्त भये ॥टेक॥
मर कर मुक्ति जहां जग जाय, तहां न मेरा मन पतिताय ॥१॥
आगे जन्म लहैं अवतारा, तहां न माने मना हमारा ॥२॥
तन छूटे गति जो पद होय, मृतक जीव मिलै सब कोय ॥३॥
जीवित जन्म सफल कर जाना, दादू राम मिले मन माना ॥४॥"
उक्त प्रकार जीवन्मुक्ति संबन्धी विचार प्रकट करके विदेह मुक्ति संबन्धी विचार कथन करने को दादूजी बोले - विदेह मुक्ति के समय नभ के समान व्यापक ब्रह्म सर्वत्र परिपूर्ण भासते हैं, उसी में प्राण मिल जाते हैं, अन्य लोकों को नहीं जाते हैं -
"तन मन नांहीं मैं नहीं, नहिं माया नहिं जीव ।
दादू एकहि देखिये, दह दिशि मेरा पीव ॥
(क्रमशः)

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