शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

= ५४ =


卐 सत्यराम सा 卐
सांई दीया दत घणां, तिसका वार न पार ।
दादू पाया राम धन, भाव भक्ति दीदार ॥ 
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साभार ~ Rp Tripathi ~
** जीवन में सदैव आनंदित कैंसे रहें ? :: एक सँक्षिप्त परिचर्चा **

सम्मानित मित्रों; 
इस बात से तो हम सब सहमत होंगे कि :- प्रत्येक व्यक्ति जीवन में आनंद; अर्थात तनाव रहित स्थिति चाहता है !! वह इस तरह से जीवन बिताना चाहता है जिसमें; ना तो उसे भूतकाल का कोई पश्चाताप हो; और ना भविष्यकाल की कोई चिंता !! इतना ही नहीं; वह तो जीवन-उपरान्त भी; आनंद-मग्न ही रहना चाहता है !! 

यदि उपरोक्त को हम आध्यात्मिक भाषा में कहें तो व्यक्ति :- 
ना सिर्फ जीवन भर; अर्थात प्रथम स्वांश से लेकर अंतिम स्वांश तक; जीवन-मुक्त मनोदशा; अर्थात; चैन की स्वांशे लेकर जीना चाहता है; वरन इस जीवन के उपरान्त भी; मोक्ष चाहता है !! अतः आइये इस विषय का हम; अध्यात्मक-विश्लेषण करें :- 

हम सब इस सत्य से तो भली-भाँति परिचित हैं कि :- 
जीवन या आयु को सुविधा के लिए भले ही हम; समय के तीन काल-खण्डों; भूतकाल, वर्तमान-काल और भविष्यकाल में विभाजित करते हैं; परन्तु जीवन सदैव; वर्तमान की स्वांश से ही संचालित होता है !! अर्थात; भूतकाल में हमने कितनी स्वांशे लीं ? या भविष्य में हम कितनी स्वांशे लेंगे ? यह सब महत्त्व-हीन है यदि शरीर को; वर्तमान की स्वांश उपलब्ध ना हो !! 

दूसरे शब्दों में; 
जीवन; वह पुष्प-माला है; जिसमें सर्वत्र एक ही पुष्प; गुथा हुआ है; और वह भी सदैव क्रमागत !! अर्थात - एक के बाद एक; दो पुष्प एक साथ; कभी नहीं !! और वह पुष्प है :- वर्तमान काल की स्वांश का पुष्प !! अर्थात जीवन; ना सिर्फ वर्तमान काल की स्वांश से संचालित रहता है; वरन जीवन में हम सब लेते भी हैं; एक बार में केवल एक स्वांश ही; दो स्वांशे एक साथ कभी नहीं !! अर्थात; जीवन सदैव वर्तमान काल में ही जीया जाता है !! 

व्योहारिकता में भले ही हम; 
इस पुष्प-माला में; पिछले जुड़े वर्तमान पल की स्वांशों के पुष्पों को; भूतकाल के पुष्प; और भविष्य में जोड़े जाने वर्तमान पल की स्वांशों के पुष्पों को; भविष्य-काल के पुष्प कहकर; पुकारते रहें; परन्तु वास्तिविकता में यह भूतकाल और भविष्यकाल से पुकारे जाने वाले दोनो स्वांश रुपी पुष्प; हैं केवल एक वर्तमान-काल के पलों के स्वांश रुपी पुष्प ही !! और जिस पल ही यह वर्तमान पल का एक ही पुष्प टूटा; उस पल ही यह पूरी माला बिखर जाती है !! 

सारांश में; 
एक वर्तमान की समझ में ही; सम्पूर्ण जीवन की समझ समाई हुई है !! अर्थात यदि हम इस एक वर्तमान पल की स्वांश को; थोड़ा गहराई से समझ लें; तो हम जीवन-मुक्त-मनोदशा और मोक्ष के लक्ष्य दोनों को; सरलता और सहजता से प्राप्त कर सकते हैं !!

वर्तमान वह है :- 
जो घट/चल रहा है; उस सर्व-शक्तिमान और घट घट में समान रूप से रमने वाले परमात्मा के विधान से; जिसे सनातन-काल से संतों ने; "राम" कहकर पुकारा है !! अतः जीवन कितनी स्वांशों का होगा; यह तो पूर्णतः परमात्मा-राम की कृपा पर निर्भर है !! 

परन्तु परमात्मा-राम की कृपा द्वारा प्रदत्त इन स्वांशों को हम; 
किस तरह से लें :- चैन से ? या बेचैन से ? यह पूर्णतः हम सब के; व्यक्तिगत चुनाव पर निर्भर है !! दूसरे शब्दों में; प्रत्येक व्यक्ति के पास; प्रतिपल दो विकल्प उपलब्ध हैं :- 

1. या तो वह; 
स्वांशों को देने वाले परमात्मा-राम के प्रति :- अकृतज्ञ रह; बाह्य-सँसार की वस्तुओं/व्यक्तिओं/घटनाओं आदि से प्रभावित हो; अर्थात; उन्हें प्रिय और अप्रिय में वर्गीकृत कर; राग-द्वेष से वशीभूत हो; कभी सुखी या कभी दुखी होकर जीवन यापन करता रहे ? 

2. या वह; 
स्वांशों को देने वाले परमात्मा "राम" के प्रति :- पूर्ण कृतज्ञता व्यक्त करता हुआ; जीवन-यापन करे !! 

(पूर्ण-कृतज्ञता व्यक्त करने से अभिप्राय है :-
स्वशन-प्रक्रिया को ही पूर्ण आनंद का विषय बना लेना !! अर्थात; सिर्फ परिणाम ही नहीं; विधि को भी पूर्ण आनंद का विषय बना लेना !! अर्थात कर्म करते समय भी उतने ही प्रसन्न रहना; जितने उसके परिणाम प्राप्त पर !! दूसरे शब्दों में; सिर्फ मंजिल ही नहीं; यात्रा को भी पूर्ण आनंद का विषय बना लेना !! 
और जब यात्रा मंगलमय होती है; 
तब मंजिल भी मंगल-मय ही प्राप्त होती है !! अर्थात; आनंदित जीवन व्यतीत करने के बाद; जीवन उपरान्त भी आनंद ही प्राप्त होता है !!) 

अतः जीवन में मंगलता लाने का एकमात्र सूत्र है :- 
दूसरे विकल्प का चुनाव करना !! जिसके लिये प्रत्येक व्यक्ति; प्रतिपल स्वतंत्र है; परन्तु यह कार्य उसके लिए; उसके सिवाय कोई अन्य नहीं कर सकता !!

अर्थात; 
आनंदित रहना या ना रहना; यह पूर्णतः व्यक्ति का; व्यक्तिगत विषय है !! जिस-पल; जब और जहाँ; अर्थात; देश-काल-परिस्थिति से मुक्त रहकर भी व्यक्ति; आनंदित(तनाव-रहित) रह सकता है; परन्तु यह संभव तभी है ? जब व्यक्ति स्वयं चाहे ? अन्यथा कभी नहीं ? 

******** ॐ कृष्णम् वन्दे जगत गुरुम् ********

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