शनिवार, 28 नवंबर 2015

पद. ४०६

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卐 सत्यराम सा 卐
https://youtu.be/tGHxMBZnNHk
४०६. आत्म परमात्म रास । एकताल ~
घट घट गोपी घट घट कान्ह, घट घट राम अमर अस्थान ॥ टेक ॥ 
गंगा जमना अंतर - वेद, सरस्वती नीर बहै प्रस्वेद ॥ १ ॥ 
कुंज केलि तहं परम विसाल, सब संगी मिल खेलैं रास ॥ २ ॥ 
तहँ बिन बैना बाजैं तूर, विकसै कँवल चंद अरु सूर ॥ ३ ॥ 
पूरण ब्रह्म परम प्रकाश, तहँ निज देखै दादू दास ॥ ४ ॥ 
इति राग भैरूं सम्पूर्णम् ॥ २५ ॥ पद ३४ ॥ 
टीका ~ ब्रह्मऋषि सतगुरुदेव आत्म - परमात्म रास दिखा रहे हैं कि हे जिज्ञासुओं ! सभी शरीरों में अन्तर्मुख वृत्ति रूप गोपियाँ और साक्षी रूप कृष्ण हैं और शुद्ध हृदय ही चैतन्य रूप कृष्ण का वृन्दावन स्थान है । इड़ा पिंगला स्वर ही गंगा यमुना बह रही है । अंतर्वेद कहिए, इन दोनों के बीच सरस्वती सुषुम्ना नाड़ी गुप्त बह रही है या जैसे सरस्वती पृथ्वी से उमंगती है, वैसे ही सुषुम्ना सरस्वती मिलने पर अर्थात् कुम्भक होने पर शरीर से प्रस्वेद आता है, वही सरस्वती का नीर प्रवाह है । साक्षी चेतनाकार वृत्तियों को जो परमानन्द प्राप्त होता है, वही हृदय रूप कुंज की क्रीड़ा है । मन, बुद्धि, इन्द्रिय आदि सब अन्तर्मुख होकर ब्रह्म स्वरूप का विचार रूपी रास खेलते हैं । उस अन्तर रास में बिना वाणी ही वृत्ति द्वारा गायन होता है और बिना हाथों के ही अनहद शब्दरूपी नगाड़े बजते हैं तथा हृदय कमल खिल उठता है । इड़ा पिंगला दोनों, सुषुम्ना नाड़ी में लय हो जाती हैं । तब फिर वहाँ एक परम प्रकाश रूप पूर्ण ब्रह्म का ही निष्कामी भक्त निज आत्म - स्वरूप से दर्शन करते हैं ।
प्रसंग : - प्रीतमसिंह(पीथा) निर्वाण गोत्र का राजपूत करडाला का रहने वाला था । वह राहगीरों को लूटने का काम किया करता था । उसने दादूजी का नाम तो सुन रखा था, परन्तु दर्शन कभी नहीं किये थे । वह दर्शन करने भुरभुरे गाँव गया और उन्हें आग्रहपूर्वक अपने गाँव कल्याणपुर(करडाला) ले आया । आवभगत करने के बाद दादूजी के सामने भोजन का थाल रखा तो दादूजी बोले - यह भोजन तो चोरी के पैसों का बना हुआ है, हम तो अच्छी कमाई के पैसों से बना हुआ भोजन ही पाते हैं, क्योंकि पाप - कर्म से कमाया अन्न खाने से साधक का मन भी दूषित हो जाता है - “जैसा खाये अन्न, वैसा होवे मन ।” इस शिक्षा को सुनकर पीथा ने उसी समय लूटपाट - चोरी का बुरा कर्म त्याग दिया और परमभक्त बन गया । फिर शुद्घ कमाई का अन्न लाकर और भोजन बनवा कर गुरु दादूदयालजी को जिमाया और आशीर्वाद प्राप्त किया ।
एक दिन पास के कोटड़ी गाँव रास - मंडली आई थी । पीथा की इच्छा रास - मंडली को रसोई और भेंट देकर रास देखने की हुई, एतदर्थ धन के लिये उसने छींछोली की घाटी में जाते हुए एक सेठ को लूटा और प्रसन्न होकर घर लौटा । सेठ को मालूम हुआ कि यह डाकू तो दादूजी का भक्त है, वह सीधा दादूजी के पास पहुँचा और पीथा से उसका धन वापस दिलाने की प्रार्थना की । दादूजी ने प्रीतमसिंह को बुलवाया और उसको इस कुकृत्य के लिए डाँटा । पीथा निर्वाण हाथ जोड़कर बोला - “महाराज !” मैंने तो भगवान् की रास - लीला देखने और रास - मंडली को भेंट व रसोई देने जैसे धार्मिक कार्य के लिये श्रीमन्त को लूटा था ।” महाराज ने समझाया - “एक पापी सारी नाव को ले डूबता है, वैसे ही एक पाप - कर्म सब धर्मों के फल को ले डूबता है । इसका धन तो लौटा दो, हम तुम्हें सच्चा रास दिखायेंगे, परन्तु आइन्दा ऐसा काम नहीं करना । बहुरि न कीजे कपट काम, हिरदै जपिये राम नाम ।”
उसी समय पीथा ने सेठ से क्षमा माँगी और उसका धन लौटा दिया । महाराज के सामने पीथा ने दृढ़ प्रतिज्ञा की -
“गंग जमुन उलटी बहे, पच्छिम उगै भान । 
पीथा चोरी ना करे, गुरु दादू की आन ॥”
दादू दयाल महाराज ने जिस पहाड़ी पर “घट घट गोपी, घट घट कान्ह, घट घट राम अमर इस्थान” कहते हुए असली वृन्दावन और यमुना नदी के तट पर श्रीकृष्ण को गोप गोपियों के साथ महारास करते दिखाया था, करडाला वासी उस डूँगरी को आज भी रास डूँगरी के नाम से सम्बोधित करते हैं ।
इति राग भैरव टीका सहित सम्पूर्ण ॥ २५ ॥ पद ३४ ॥

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