मंगलवार, 29 मार्च 2016

= विन्दु (२)७२ =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज,
पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ७२ =*
*= सत्संग संकीर्तन =*
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टौंक संत संम्मेलन में अपने शिष्यों के सहित दादूजी पधारे हैं, यह सुनकर संत तथा भक्त लोग बहुत संख्या में वहाँ आ गये थे । गृहस्थ तो अपने खाने-पीने का प्रबन्ध आपही करते थे किंतु संत भी बहुत आ गये थे ।
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माधवकाणी को इतना भरोसा नहीं था कि इतने अधिक संत पधार जायेंगे । उन्होंने जितने निमंत्रण दिये थे उनसे दुगनी सामग्री तो तैयार की थी किंतु अब आये हुये संत समुदाय को देखते हुये तो उनकी सामग्री तो कुछ भी नहीं थी अर्थात् बहुत कम ज्ञात होती थी ।
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यह देखकर माधवकाणीजी ने दादूजी के पास आकर प्रार्थना की - भगवन् ! इस समय मैं आपकी शरण आया हूं, आपके बिना अन्य कोई भी मेरी लाज बचाने वाला मुझे नहीं दीख रहा है । इस समय आपही मेरी लज्जा रख सकेंगे ।
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*= भोजन सामग्री अपार होना =*
माधवकाणी की बात सुनकर दादूजी ने कहा सब की लज्जा परमेश्वर रखते हैं, आपकी लज्जा भी वे रखेंगे किंतु आप यह तो बतायें, आपको इस समय क्या कष्ट है ? माधवकाणी ने कहा - भगवन् ! जन समुदाय को देखते हुये भोजन सामग्री अति अल्प है और अब पंक्ति का समय भी होने वाला है । मैं किसी भी प्रकार पंक्ति के समय तक इतनी सामग्री तैयार करने में असमर्थ हूँ ।
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माधवकाणी का उक्त वचन सुनकर परम योगेश्वर दादूजी महाराज ने कहा - चिन्ता मत करो, निरंजनदेव पास में ही हैं फिर यह पद सुनाया -
"जनि सत छाडे बावरे, पूरक है पूरा,
सिरजे की सब चिन्त है, देबे को शूरा ॥टेक॥
गर्भवास जिन राखिया, पावक तैं न्यारा ।
युक्ति यत्न कर सींचिया, दे प्राण अधारा ॥१॥
कुंज कहा धर संचरे, तहां को रखवारा ।
हिम हरते जिन राखिया, सो खसम हमारा ॥२॥
जल थल जीव जिते रहैं, सो सबको पूरे ।
संपट शिला में देत हैं, काहे नर झूरे१ ॥३॥
जिन यह भार उठाइया, निर्वाहे सोई ।
दादू छिन न विसारिये, तातैं जीवन होई ॥४॥
(क्रमशः)


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