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स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - श्रीसुन्दर ग्रंथावली
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*= ज्ञानसमुद्र ग्रन्थ ~ तृतीय उल्लास =*
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*अथ गोरक्ष-उक्ति ~ चर्पट*
*सोहं सोहं सोहं हंसो ।*
*सोहं सोहं सोहं अंसो ।*
*स्वासो स्वासं सोहं जापं ।*
*सोहं सोहं आपै आपं१॥६१॥*
(१-सोहं-हंसो ~ यह ‘हंस’ नाम का ‘अजपा’ गायत्रीमन्त्र है । ‘गोरक्षपद्धति’ शतक -१ के श्लोक ४२-४६ तक इसका वर्णन है ।
‘हकारेण बहिर्याति सकारेण विशेत्पुन: ।
हंसहंसेत्यमुं मंत्रं जीवो जपति सर्वदा ।’
‘अजपानाम गायत्री योगिनां मोक्षदायिनी’ । इत्यादि ।
‘योगचिन्तामणि’ आदि ग्रन्थों में भी इसका वर्णन है ।)
(परमसिद्ध महात्मा श्रीगोरखनाथजी कहते हैं-) जो योगी ‘सोहं-हंसो’ नामक ‘अजपा’ गायत्री मन्त्र का स्वास-स्वास पर जप करता है, अर्थात् हकार का उच्चारण करते समय स्वास को बाहर फेंकता है तथा सकार के उच्चारण के साथ स्वास अन्दर खींचता है तो वह योगी एक दिन मोक्ष पद प्राप्त कर लेता है, अर्थात् वह ‘सोहं’ स्वरुप योगज्ञान का अधिष्ठाता बन जाता है ॥६१॥
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*द्वादश मात्रा पूरक करणं ।*
*द्वादश मात्रा कुंभक धरणं ।*
*द्वादश मात्रा रेचक जाणं ।*
*पूरबवत् सु विपर्यय ठाणं ॥६२॥*
(गोरक्ष भगवान् का मत है-) पहले पूरक की मात्रा(बारह बार ॐ का उच्चारण) करनी चाहिये, फिर बारह मात्रा कुम्भक की और अन्त में बारह मात्रा ही रेचक की करनी चाहिये । फिर दूसरे प्राणायाम में यही विधि विपरीत गति से भी अपनानी चाहिये ॥६२॥
(क्रमशः)

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