सोमवार, 28 मार्च 2016

= विन्दु (२)७२ =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज,
पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ७२ =*
*= सत्संग संकीर्तन =*
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दादूजी महाराज के यहां सत्संग, संकीर्तन आदि होते ही रहते थे । दादूजी के शिष्यों में श्रेष्ठ वक्ता, अच्छे गायक, आदि विशेष-विशेष योग्यता वाले संत थे । टौंक में संत सम्मलेन के समय कथा रज्जबजी करते थे । रज्जबजी का प्रवचन नाना युक्ति और दृष्टांतों के कारण बहुत रोचक बन जाता था ।
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रज्जबजी का प्रवचन अति रोचक बनने में कारण दादूजी महाराज का वरदान ही था । एक समय आमेर में एक अच्छे कथा-वाचक आये थे, वे अपने प्रवचन में अति सुन्दर सुन्दर युक्ति व दृष्टांतों का प्रयोग करते थे । उनकी कथा सुनने रज्जबजी भी जाया करते थे । उस समय रज्जबजी कथा तो करते थे किंतु उस कथावाचक के समान इनको युक्ति, व दृष्टांत देना नहीं आता था ।
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एक दिन कथा सुनकर लौटे तब वे इस विचार से चिन्तित हो रहे थे कि मेरे को इस पंडित के समान युक्ति तथा दृष्टांत देना नहीं आता है । फिर वे दादूजी महाराज के पास आये तब दादूजी ने उनका मुख उदास देखकर पूछा - उदास क्यों हो ?
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रज्जबजी ने कहा - गुरुदेव ! आजकल यहां एक अच्छा कथा वाचक आया हुआ है । वह अपनी कथा में अति सुन्दर नाना युक्ति व दृष्टांतों का प्रयोग करता है । उसके समान युक्ति व दृष्टांत मेरे को नहीं आते इसी चिन्ता से उदासी है । रज्जबजी की उक्त बात सुनकर दादूजी रज्जबजी को उस समय वरदान दिया - "तुम को अब से आगे उस पंडित से भी अच्छी युक्ति और दृष्टांत देना आजायगा ।"
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उस दिन से रज्जबजी को अति सुन्दर और युक्ति और दृष्टांत देना आ गया था । यही कारण था कि रज्जबजी का प्रवचन अति सुन्दर होता था । रज्जबजी गंभीर से गंभीर विषय को युक्ति तथा दृष्टांतों से सुगम बनाकर सर्व साधारण को अनायास ही समझा देते थे । कथा के आदि में निर्गुण ब्रह्म के नामों की सुन्दर ध्वनि होती थी । एक संत आगे बोलते थे फिर सब एक साथ बोलते थे ।
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इससे सब सत्संगी प्रभु के प्रेम में निमग्न हो जाते थे । उस समय अद्भुत रस बरसने लगता था । कथा के पश्चात् संकीर्तन होता था, उस में संतों के निर्गुण सम्बन्धी भजन गाये जाते थे । उस समय जनगोपालजी मृदंग बजाते थे, गरीबदासजी वीणा बजाते थे, मसकीनदासजी मंजीरा बजाते थे । कुछ अन्य संत ताल बजाते थे ।
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इन संतों के निर्गुण पदों का संकीर्तन सुनकर अच्छे-अच्छे सत्संगी और सर्व साधारण जनता सभी मोहित हो जाते थे । अति अद्भुत संकीर्तन होता था । क्यों न हो, करने वाले भी तो उच्चकोटि के प्रभु के प्यारे संत ही थे । श्रोतागण सुनते-सुनते तृप्त नहीं होते थे और यह अभिलाषा करते रहते थे कि - ऐसा सत्संग, संकीर्तन प्रतिक्षण होता रहे तो बहुत ही अच्छा हो ।
(क्रमशः)

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