卐 सत्यराम सा 卐
निर्गुण राम रहै ल्यौ लाइ,
सहजैं सहज मिलै हरि जाइ ॥ टेक ॥
भौजल व्याधि लिपै नही कबहूँ,
करम न कोई लागै आइ ।
तीनों ताप जरै नहिं जियरा,
सो पद परसै सहज सुभाइ ॥ १ ॥
जन्म जरा जोनी नहिं आवै,
माया मोह न लागै ताहि ।
पाँचों पीड़ प्राण नहीं व्यापै,
सकल सोधि सब इहै उपाइ ॥ २ ॥
संकट संशय नरक न नैनहूँ,
ताको कबहूँ काल न खाइ ।
कंप न काई भय भ्रम भागै,
सब विधि ऐसी एक लगाइ ॥ ३ ॥
सहज समाधि गहो जे दिढ़ करि,
जासौं लागै सोइ आइ ।
भृंगी होइ कीट की न्यांई,
हरि जन दादू एक दिखाइ ॥ ४ ॥
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साभार ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi ~
******मन खुदायम, मन खुदा ****
कबीर साहिब कहते है :-
सुमरिन से मन लाईये, जैसे कीप भिरंग ।
कबीर बिसरै आप को, होय जाय तेहि रंग ।।
भृंगी एक प्रकार का कीङा होता है । वह बाहर से एक दूसरा कीङा लाकर उसे अपनी तवज्जह देता है । यदि वह तवज्जह ले लेता है तो वह भृंगी बन जाता है । फिर भृंगी उसे अपने साथ ले जाता है । इसी प्रकार यदि आप मालिक के नाम का सुमरिण करेंगे तो मालिक में समा जायेंगे, मालिक का रूप हो जायेंगे । जो खुदा का नूर में मिलकर नूर हो गया, वह मनुष्य नहीं रहा । जिसका ध्यान करोगे उसका रूप हो जाओगे ।
#### सत्य राम सा

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