सोमवार, 28 मार्च 2016

= १८२ =

卐 सत्यराम सा 卐
निर्गुण राम रहै ल्यौ लाइ, 
सहजैं सहज मिलै हरि जाइ ॥ टेक ॥
भौजल व्याधि लिपै नही कबहूँ, 
करम न कोई लागै आइ ।
तीनों ताप जरै नहिं जियरा, 
सो पद परसै सहज सुभाइ ॥ १ ॥
जन्म जरा जोनी नहिं आवै, 
माया मोह न लागै ताहि ।
पाँचों पीड़ प्राण नहीं व्यापै, 
सकल सोधि सब इहै उपाइ ॥ २ ॥
संकट संशय नरक न नैनहूँ, 
ताको कबहूँ काल न खाइ ।
कंप न काई भय भ्रम भागै, 
सब विधि ऐसी एक लगाइ ॥ ३ ॥
सहज समाधि गहो जे दिढ़ करि, 
जासौं लागै सोइ आइ ।
भृंगी होइ कीट की न्यांई, 
हरि जन दादू एक दिखाइ ॥ ४ ॥
======================
साभार ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi
******मन खुदायम, मन खुदा ****
कबीर साहिब कहते है :-
सुमरिन से मन लाईये, जैसे कीप भिरंग ।
कबीर बिसरै आप को, होय जाय तेहि रंग ।।
भृंगी एक प्रकार का कीङा होता है । वह बाहर से एक दूसरा कीङा लाकर उसे अपनी तवज्जह देता है । यदि वह तवज्जह ले लेता है तो वह भृंगी बन जाता है । फिर भृंगी उसे अपने साथ ले जाता है । इसी प्रकार यदि आप मालिक के नाम का सुमरिण करेंगे तो मालिक में समा जायेंगे, मालिक का रूप हो जायेंगे । जो खुदा का नूर में मिलकर नूर हो गया, वह मनुष्य नहीं रहा । जिसका ध्यान करोगे उसका रूप हो जाओगे ।
#### सत्य राम सा

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें