बुधवार, 30 मार्च 2016

= स्मरण का अंग =(२/४-६)

॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
"श्री दादू अनुभव वाणी" टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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= स्मरण का अँग २ =
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मन प्रबोध
दादू नीका नाम है, तीन लोक तत सार ।
रात दिवस रटबौ करो, रे मन इहै विचार ॥४॥
४ - ९ में मन को नाम स्मरण का उपदेश दे रहे हैं - स्वर्ग, मृत्यु, पातालादि सभी विश्व का सार तत्व जो परमात्मा है, उसकी प्राप्ति के सभी साधनों में नाम स्मरण ही अति श्रेष्ठ और सुगम साधन है । अत: हे मन ! इस मनुष्य शरीर में रहते हुए विचार पूर्वक कामादि दोषों को त्याग कर निरन्तर नाम - जप किया कर ।
दादू नीका नाम है, हरि हिरदै न विसार ।
मूरति मन माँहीं बसे, श्वासैं श्वास संभार ॥५॥
नाम - स्मरण में देश कालादि नियम न होने से यह साधन सबके लिए अच्छा है । हृदय से हरि को न भूल, हरि की मूर्ति आत्म रूप से हृदय में स्थित है । श्वास - प्रश्वास के साथ स्मरण करते हुए हृदयस्थ हरि को देखने का यत्न कर ।
श्वासैं श्वास संभालताँ, इक दिन मिल है आइ ।
सुमिरण पैंडा सहज का, सद्गुरु दिया बताइ ॥६॥
श्वास - प्रश्वास के साथ स्मरण करने से एक दिन अवश्य प्रकट रूप से हृदय में आकर प्रभु मिलेंगे । ब्रह्म प्राप्ति रूप सहजावस्था की प्राप्ति का मार्ग भी स्मरण ही है, यह हमारे सद्गुरु ने प्रथम ही काँकरिया तालाब पर बता दिया था ।
(क्रमशः)

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