रविवार, 27 मार्च 2016

= ज्ञानसमुद्र(तृ. उ. ५८-९) =

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स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - श्रीसुन्दर ग्रंथावली 
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान, 
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*= ज्ञानसमुद्र ग्रन्थ ~ तृतीय उल्लास =*
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*सोरठा*
*बीज मन्त्र संयुक्त, षोडश पूरक पूरिये ।* 
*चवसठि कुंभक उक्त, द्वात्रिंशति करि रेचना ॥५८॥*
प्रथम दाहिने नथुने को अँगूठे से दबाकर बाँये से स्वास इतनी देर तक खींचे कि बीजमन्त्र(ॐकार) १६ बार मन में बुल जाये । यह ‘पूरक’ हुआ । फिर बाँये नथुने को तत्काल अनामिका(तीसरी-अँगूली) से दबाकर छाती में स्वास इतनी देर रोके कि बीजमन्त्र चौंसठ बार बुल जाय । इसे ‘कुम्भक’ कहते हैं । फिर दाहिने नथुने पर से अँगूठा धीरे-धीरे हटाता जाय और स्वास आहिस्ता-आहिस्ता इतनी देर में निकाले जितनी देर में बत्तीस बार बीजमन्त्र बुल जाय । यह ‘रेचक’ कहलाता है ॥५८॥
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*चौपाई*
*बहुरि विपर्यय ऐसैं धारै ।* 
*पूरि पिंगला इडा निकारै ।* 
*कुंभक राखि प्राण कौं जीतै ।* 
*चतुर्बार अभ्यास व्यतीतै ॥५९॥*
फिर इस तरह उलटा प्राणायाम कर पिंगला से पूरक करके बीच में कुम्भक रखकर इडा से रेचक करे । इस तरह(अनुलोम-प्रतिलोम) चार बार प्राणायाम का अभ्यास करे ॥५९॥
(क्रमशः)

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