मंगलवार, 29 मार्च 2016

= १८५ =

卐 सत्यराम सा 卐
(राग केदार)
म्हारा रे वाहला ने काजे, हृदये जोवा ने हौं ध्यान धरूं ।
आकुल थाये प्राण मारा, कोने कही पर करूँ ॥ टेक ॥
संभार्यो आवे रे वाहला, वेहला एहों जोई ठरूं ।
साथीजी साथे थइ ने, पेली तीरे पार तरूं ॥ १ ॥
पीव पाखे दिन दुहेला जाये, घड़ी बरसां सौं केम भरूं ।
दादू रे जन हरि गुण गाता, पूरण स्वामी ते वरूं ॥ २ ॥
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साभार ~ वाया ~ Savita Savi Lumb "भगवान् श्रीकृष्ण"

भक्त शिरोमणी संत नरसी मेहता तथा ‘केदार’ राग का जादू...!

भगवान का नाम होश खोकर सुंदरता से आलापना ही उनकी चाह, ब्रह्मानंद था। भजन गाते केदार राग में वे रंग जाते। इस राग की रसमोहिनी से प्रत्यक्ष श्रीकृष्ण उन्हें अंकित हुए थे । 
इस राग से उन्होंने अनेकों के दुख दूर किए तथा कितने ही लोगों का सुख बढाया था। राग के स्वरों से सर्पदंश हुए एक हरिजन बालक के प्राण वापस आए थे । एक बार एक भला गृहस्थ ब्राह्मण नरसी के पास आया । बेटी की शादी हेतु धन कहां से लाया जाए यह चिंता उसे सता रही थी । नरसी ने उससे पूछा, ‘‘कितना धन चाहिए ?’’ ब्राह्मण ने डरते डरते उत्तर दिया, ‘‘५०० रुपये.’’ 
वे साहूकार के घर गए । लोभी तथा चाणाक्ष साहूकार को नरसी का भक्ति वैभव मालूम था । उनके केदार राग की कीर्ती उसने सुनी थी । उसने कहा, ‘‘पैसे देता हूं; किंतु धरोहर क्या रखोगे?’’ साहूकार ने एक मार्ग सुझाया, ‘‘तुम्हारा केदार राग धरोहर रखो । पैसा देता हूं ।’’ संत नरसी मेहता के पास वह ही एक मूल्यवान चीज थी। फिर भी ‘अब श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन से वंचित रहुंगा । जीवन का सर्वश्रेष्ठ आनंद खो बैठुंगा’, यह विचार उनके मनमें नहीं था । उन्होंने कहा, ‘‘केदार राग धरोहर के रूप में रखो; किंतु ब्राह्मण को धन दो।’’ ‘ब्याज समेत पैसा वापस होने तक नरसी केदार राग भूले से भी गाएगा नहीं’, यह प्रमुख शर्त थी । 
मंगल कार्य संपन्न हुआ । उस आनंद के सामने अपने नुकसान की खंत संत नरसी को नहीं लगी । केदार राग के बिना भजन, कीर्तन शुरू था; किंतु मजा नहीं था, मन लग नहीं रहा था । भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन बिना हृदय की प्यास बुझ नहीं रही थी । 
दिन-पर-दिन निकल गए; किंतु धन नहीं मिल रहा था। साहूकार का कर्जा नहीं उतर रहा था तथा केदार राग बंधमुक्त हुए बिना नरसीं को शांति नहीं मिल रही थी । उसी समय निंदकों ने भी उनकी भक्ति झूठी होने के आरोप किए । राजा द्वारा नरसीं को बुलाया गया । उनकी भक्ति की परिक्षा लेना तय हुआ- ‘राजमहल के एक कक्ष में श्रीकृष्ण की एक मूर्ति रखी गई । 
मूर्ति के हाथ में एक पुष्पहार दिया गया । उस मूर्तिके आगे नरसीं अपना भजन, कीर्तन करें । श्रीकृष्ण सजीव होकर नरसीं के गले में पुष्पहार पहनाए । यदि यह बात विशिष्ट कालावधिमें घटित नहीं हुई, तो नरसी के उपर लगाए आरोप सही मानकर शासन किया जाएगा ।’ यह राजाज्ञा नरसीं को सुनाई गई । नरसी अविचल थे ! उन्होंने कहा, ‘‘प्रभूकी इच्छा होगी वैसा ही होगा ।’’ नरसीं ने श्रीकृष्ण के सामने आसन जमाया, टाळवीणा ली । ‘नरसीं की भक्ति सच्ची अथवा निंदकों की आसुरी शक्ति सच्ची’, यह निर्णय लगना था । 
नटनागर को भक्तों की परिक्षा लेने का शौक ! नरसीं हेतु प्रकट होना, श्रीकृष्ण के लिए असंभव थोडे ही था ! केदार राग आलापे बिना श्रीहरी अपनी जगह से न हिले, क्या संत नरसी मेहता की साधना, भक्ति इतनी लूली-लंगडी, दुबली थी ? 
समय आगे-आगे जा रहा था । बीच रात का समय आया । नरसीं की कसौटी का क्षण दूर नहीं था । विरोधकों की आशाएं जागृत हुई । उसी समय नगरी में चमत्कार हुआ । साहूकार के दरवाजे पर हलकी सी थपकी हुई । नरसी मेहता की आवाज उसे सुनाई दी, ‘‘कृपा करके दरवाजा खोलिए ।’’ साहूकार ने स्वागत किया। नरसीं ने ब्याज एवं मूल रखा तथा कहा, ‘‘पैसे वापस करने में देर हुई । क्षमा करना । ‘केदार’ राग मुक्त हुआ ऐसी रसीद दो ।’’ 
साहूकार ने पैसे लिए तथा करार पत्र निकाला । पैसा पहुंचनेके हस्ताक्षर कर कागज संत नरसी मेहता को दे दिया । इधर भजन करते संत नरसी मेहता ने ऐसे ही आंख खोलकर कृष्णमूर्ति की तरफ देखा। उतने में एक कागज हलके से उनके सामने आया । ब्याज-मूल पहुंचने का साहूकार का हस्ताक्षर किया करारपत्र देंखकर नरसी अचंभित हुए ! उनके आनंदकी सीमा नहीं रही। श्रीकृष्णकी लीला अगाध थी । उनका केदार मुक्त हुआ था! नरसीं ने केदार राग में भजन आलापना आरंभ किया। 
केदार के स्वरों से एक अलग ही दिव्य स्वरभावविश्व निर्माण हुआ ।
श्रीकृष्ण की मूर्ति की चारों ओर एक तेजोवलय निर्माण हुआ । निंदकों का दिल धक से रह गया ! नरसीं की आखों से प्रेमाश्रू बहने लगे । इतनी देर जड अचेतन श्रीकृष्णमूर्ति सजीव हो गई तथा अपने हाथ की पुष्पमाला नरसीं के गले में डालने हेतु आगे बढने लगी । केदार की स्वलहरों से प्रसन्न हुए, भक्तों की लाज रखने वाले गिरधर नागर अपने भक्तके गले में माला पहनाकर क्षणार्ध में अंतर्धान हो गए......!

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