मंगलवार, 29 मार्च 2016

= १८७ =

卐 सत्यराम सा 卐
भाव भक्ति उपजै नहीं, साहिब का प्रसंग ।
विषय विकार छूटै नहीं, सो कैसा सत्संग ॥ 
बासण विषय विकार के, तिनको आदर मान ।
संगी सिरजनहार के, तिन सौं गर्व गुमान ॥
अंधे को दीपक दिया, तो भी तिमिर न जाय ।
सोधी नहीं शरीर की, तासन का समझाइ ॥ 
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साभार ~ Manoj Puri Goswami
निष्काम एवं संकल्प रहित कर्म योग-यात्रा को आगे बढ़ाते हैं 
--- गीता श्लोक 6।3 ~

गणित में 2+1=3 होता है, तीन में एक एवं दो, दोनों हैं लेकिन दिखते नहीं, ठीक इस तरह गीता का भी समीकरण है --- प्रकृति + पुरुष = मनुष्य, जिसमें न तो प्रकृति दिखती है और न पुरुष । गणित समीकरण के तीन में एक एवं दो को देखनें वाला बुद्धिबादी गणितज्ञ कहलाता है और गीता के समीकरण में मनुष्य में प्रकृति-पुरुष को देखनें वाला तत्त्व-ज्ञानी होता है । गीता सूत्र 6.3 कह रहा है --- योग में इच्छा-संकल्प की उर्जा नहीं होती -- इस बात को समझना चाहिए । योग क्या है ? किसी भी तरह से परमात्मा में रूचि पैदा करनें का मार्ग, योग है - जिसमें गुणों के तत्वों को समझ कर ऐसा बन जाना होता है की गुणों के तत्वों का स्वतः त्याग हो जाता है । 
यह यात्रा अंतहीन यात्रा है जिसका प्रारम्भ तो है लेकिन कोई अंत नहीं । योग सिद्धि से बैराग्य मिलता है जिसमें गुणों के तत्वों का त्याग हो जाता है लेकिन अहंकार एक मात्र तत्त्व ऐसा है जो पुनः योग को खंडित कर देता है । योग खंडित होना क्या है ?
योगी जब अपनें प्रसंशकों से घिरता जाता है तब उस पर राजस-तामस गुणों का प्रभाव एवं अहंकार का असर दिखने लगता है और इस स्थिति को कहते हैं --- योग खंडित होना ।
बिषय से बैराग्य तक की यात्रा कर्म-योग की यात्रा है जो एक सुलभ यात्रा है लेकिन बैराग्य से आगे की यात्रा ज्ञानकी यात्रा है जो परा भक्ति में प्रवेश कराती है । ज्ञान की यात्रा में गुण तत्वों का असर तो नहीं होता लेकिन जैसे - जैसे गुण तत्वों की पकड़ कमजोर होती जाती है, अहंकार और पैना होता जाता है , जो इस बात को समझकर चलते हैं, उनको बुद्धत्व मिलता है और जो नहीं चल पाते, वे योग का ब्यापार करनें लगते हैं । गीता गुणों का योग है, जहां -----
न भोग का स्वाद मिलता है
न चाह होती है
न अहंकार होता है
न सुख-दुःख होता है
न मन होता है और
न लक्ष्य का पता होता है ।
====ॐ=====

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