॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
"श्री दादू अनुभव वाणी" टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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= स्मरण का अँग २ =
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दादू पिंजर पिंड शरीर का, सुवटा सहज समाइ ।
रमता सेती रम रहे, विमल विमल जश गाइ ॥४३॥
अविनाशी सौं एक ह्वै, निमष न इत उत जाइ ।
बहुत बिलाई क्या करे, जे हरि हरि शब्द सुनाइ ॥४४॥
यदि शुक पक्षी का शरीर पिँजरे में रहे तो बहुत बिल्लियाँ भी
उसके शरीर का क्या कर सकती हैं ? वैसे
ही यदि साधक का मन निरँतर स्मरण द्वारा सहजावस्था में जाकर रमता राम से रमण करता
रहे और उस पवित्र प्रभु का पवित्र यश - गान करता रहे, इस लोक
और परलोक के भोगों में एक निमेष मात्र भी न जाय, निरँतर हरि
- हरि शब्द उच्चारण करता हुआ अविनाशी ब्रह्म से मिलकर उससे अभेद होजाय, तब एक मृत्यु तो क्या, बहुत मृत्युएं भी उसका क्या
कर सकती हैं?
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दादू जहां रहूं तहां राम सौं, भावै कंदलि१ जाइ ।
भावै गिरि परबत रहूं, भावै गृह बसाइ ॥४५॥
हे राम ! मेरी यह प्रार्थना है - मैं जहां भी रहूं वहां आपके
चिन्तन में ही लगा रहूं । चाहे मुझे गुफा१ में वा गिरि शिखर पर वा
पर्वत के मध्य भाग में वा घर में रहना पड़े ।
(क्रमशः)

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