卐 सत्यराम सा 卐
एकै अक्षर पीव का, सोई सत्य करि जाण ।
राम नाम सतगुरु कह्या, दादू सो परवाण ॥
पहली श्रवण द्वितीय रसना, तृतीय हिरदै गाइ ।
चतुर्दशी चेतन भया, तब रोम रोम ल्यौ लाइ ॥
दादू नीका नांव है, तीन लोक तत सार।
रात दिवस रटबो करो, रे मन इहै विचार ॥
दादू नीका नांव है, हरि हिरदै न बिसारि।
मूरति मन मांहैं बसै, सांसैं सांस संभारि ॥
सांसैं सांस संभालतां, इक दिन मिलि है आइ।
सुमिरण पैंडा सहज का, सतगुरु दिया बताइ ॥
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साभार ~ Krishnacharandas Aurobindo ~
जब भगवान असुर-राक्षस तथा दुष्टों का संहार कर अपने धाम को जा रहे थे तब उध्दवजी ने भगवान को उन्हीं की प्रेरणा से भक्तों को एक संबल के रुपमें अनुग्रह की प्रार्थना की...... तब भगवान ने अपनी शक्ति एवं प्रकाश को श्रीमद्भागवत में सन्निहीत कर दिया...... मतलब तब तक भ.वेदव्यासजी ने भागवत की रचना कर दी थी...... !!!
भागवत के प्रथम श्रोता महाराज परिक्षित थे, जिनको शमिक ऋषि के पुत्र शृँगी ने सातवें दिन तक्षक के डसने से मृत्युका शाप दिया था।
महाराज परिक्षित अपने पुत्र जनमेजय को राज्यका भार सौंपकर स्वयम् गंगातट पर अनशन का व्रत लेकर बैठे।
भगवान की प्रेरणा से उनके पास भगवत प्राप्त अत्रि, वशिष्ठ, च्यवन, शरद्वान, अरिष्टनेमि, भृगु, अंगिरा, पराशर, विश्वामित्र, परशुराम, उतथ्य, इन्द्रप्रमद, इध्मवाह, मेधातिथि, देवल, आर्ष्टिशेन, भारद्वाज, गौतम, पिप्पलाद, मैत्रेय, और्व, कवश, अगत्स्य, भ.व्यास, नारद ब्रह्मर्षियों का शुभागमन हुआ।
असल में ये सब त्रिकालदर्शि महापुरुषगण महाराज परिक्षित के परमधाम प्राप्ति की घटना की साक्ष एवम् भागवत कथा श्रवण के हेतु पधारे थे...
परिक्षित पर भगवान का अनुग्रह पाण्डवों के कारण गर्भमें ही हो गया था जब अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से उनकी रक्षा की थी। अब भी भगवान की प्रेरणा से ऐसे महापुरुषों का उनके पास आगमन हुआ जो अपने नाममात्र से महापापों को भस्म कर सकते थे। भगवान का शुकदेवजी के रुप में आगमन परिक्षित के बहाने सारे संसार के दावानल में झुलसते जीवों पर भागवत कथामृत का अनुग्रह करने ही हुआ।
राजा परिक्षितने भ.शुकदेवजी को परमसिध्दि का स्वरूप और साधन के सम्बन्ध में प्रश्न किया। जो पुरुष सर्वथा मरणासन्न हैं उसे क्या करना चाहिये? मनुष्य मात्र को क्या करना चाहिये। वे किसका श्रवण, किसका जप, किसका स्मरण और किसका त्याग करें?
श्री शुकदेवजी ने कहा, "परिक्षित! तुम्हारा प्रश्न अति उत्तम हैं। घरगृहस्थि के काम-धंधों में उलझे गृहस्थ को हजारो बातें कहने-सुनने एवं सोचने, करने की रहती हैं। उनकी सारी उम्र यूँ ही बीत जाती हैं । रात नींद या स्त्री-प्रसङ्ग से कटती और दिन धन की हाय-हाय या कुटुम्बियों के भरण-पोषण में समाप्त हो जाता हैं। संसार में जिन्हें अपना अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्धी कहा जाता है, वे शरीर, पुत्र, स्त्री आदि कुछ नहीं हैं, असत् हैं; परन्तु जीव उनके मोह में ऐसा पागल हो जाता है कि रात-दिन उनको मृत्युका ग्रास होते देखकर भी चेतता नहीं। इसलिये जो सर्वथा अभयपद प्राप्त करने का ईच्छुक हैं उसे सर्वात्मा, सर्वशक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का श्रवण, कीर्तन एवं स्मरण करना चाहिये !मनुष्य-जन्मका यही -इतना ही लाभ हैं कि चाहे जैसे हो - ज्ञान से,भक्ति से अथवा अपने धर्मनिष्ठा से जीवन को ऐसा बना लिया जाय कि मृत्यु के समय भगवान की स्मृति अवश्य बनी रहे।

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