सोमवार, 18 अप्रैल 2016

= ४६ =

卐 सत्यराम सा 卐
मन मैला मन ही सौं धोइ, 
उनमनि लागै निर्मल होइ ॥टेक॥
मन ही उपजै विषय विकार, 
मन ही निर्मल त्रिभुवन सार ॥१॥
मन ही दुविधा नाना भेद, 
मन ही समझै द्वै पख छेद ॥२॥
मन ही चंचल चहुँ दिशि जाइ, 
मन ही निश्चल रह्या समाइ ॥३॥
मन ही उपजै अग्नि शरीर, 
मन ही शीतल निर्मल नीर ॥४॥
मन उपदेश मनही समझाइ, 
दादू यहु मन उनमनि लाइ ॥५॥

*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. ३८७)*
=====================
साभार ~ oshoganga.blogspot.com

मन एक जन्म से दूसरे जन्म मे चला जाता है। मृत्यु मे केवल शरीर छूटता है, मन नहीँ छूटता। मन तो तभी छूटता है, जब मनुष्य मुक्त होता है। मृत्यु की सामर्थ्य मन का अंत करने की नहीँ है। मृत्यु केवल शरीर को मिटा पाती है।
समाधि मे मिटते हैँ दोनो-शरीर और मन-और शेष रह जाता है वही, जो अमृत है, जिसकी मृत्यु हो नहीँ सकती। मन की छाया जन्मोँ-2 तक आत्मा पर बनती रहती है और धीरे-2 आत्मा को भी ऐसा प्रतीत होने लगता है कि जो मन मे है, वही मै हूं।
ये ही है गांठ। ये ही है मनुष्य का संसार। इस गांठ से मुक्त होने का एकमात्र उपाय है बिना मन के हो जाए मनुष्य। मन को हटा दे और जगत को आमने-सामने देख ले। एक झलक भी मिल जाए मन के बिना जगत की तो मनुष्य को ये स्पष्ट हो जाएगा कि भीतर कभी कुछ गया नहीँ।भीतर का दर्पण सदा निर्मल है।
सारे बिँब आए और गए हैँ, जन्मोँ-2 की कथाएं बीती हैँ लेकिन वहां कोई रेखा छूटी नहीँ है। ये जो निर्मल स्वभाव का अनुभव है,वही परम ब्रह्म है।ब्रह्म जब मन के साथ बंधता है तो संसार और जब मन से टूटता है तो परम ब्रह्म हो जाता है। आत्मा जब बंधती है मन के साथ तो शरीर अनिवार्य हो जाता है वासनाओँ की तृप्ति के लिये।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें