मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

= स्मरण का अंग =(२/४६-८)

॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
"श्री दादू अनुभव वाणी" टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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= स्मरण का अँग २ =
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भावै जाइ जलहरि२ रहूं, भावै शीश नवाइ ।
जहां तहां हरि नाम सौं, हिरदै हेत लगाइ ॥४६॥
हे राम ! मेरी यह प्रार्थना है - मैं जहां भी रहूं वहां नीचे शिर और ऊपर पैर करके भी झूलना पड़े वा और भी जहां तहां नाना क्लेश उठाने पड़े तो भी कोई चिन्ता नहीं, किन्तु ऐसी कृपा करें कि मेरे हृदय का प्रेम निरन्तर आपके नाम में ही लगा रहे ।
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मन प्रबोध
दादू राम कहे सब रहत है, नख शिख सकल शरीर ।
राम कहे बिन जात है, समझी मनवा बीर ॥४७॥
४६ - ४९ में मन को स्मरण विषयक उपदेश कह रहे हैं - भैया मन ! तू मेरी यह बात निश्चय पूर्वक समझ ले - राम का स्मरण करने पर नख से शिखा पर्यन्त सब शरीर के इन्द्रियादि कुमार्ग में जाने से रुक जाते हैं और बिना स्मरण करे विधि का अतिक्रमण करके विषयों में दौड़ जाते हैं ।
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दादू राम कहे सब रहत है, लाहा मूल सहेत ।
राम कहे बिन जात है, मूरख मनवा चेत ॥४८॥
निष्काम भाव से राम का स्मरण करने पर प्राणी का आयु रूप मूलधन विषय विकारों में नष्ट होने से रुक जाता है और स्मरण द्वारा अहँकार नष्ट होने से उस आयु से होने वाला शुभ कर्म का फल रूप लाभ भी नष्ट नहीं होता । राम के स्मरण बिना उक्त दोनों ही व्यर्थ नष्ट हो जाते हैं । अत: मूर्ख मन ! सावधान होकर राम का भजन कर ।
(क्रमशः)

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