सोमवार, 18 अप्रैल 2016

रथयात्रा

卐 सत्यराम सा 卐
मन मोहन मेरे मन ही मांहिं, 
कीजै सेवा अति तहाँ ॥ टेक ॥
तहँ पायो देव निरंजना, 
परगट भयो हरि यह तना ।
नैनन ही देखूं अघाइ, 
प्रगट्यो है हरि मेरे भाइ ॥ १ ॥
मोहि कर नैनन की सैन देइ, 
प्राण मूंसि हरि मोर लेइ ।
तब उपजै मोकौं इहै बानि, 
निज निरखत हूँ सारंगपानि ॥ २ ॥
अंकुर आदैं प्रगट्यो सोइ, 
बैन बाण तातैं लागे मोहि ।
शरणै दादू रह्यो जाइ, 
हरि चरण दिखावै आप आइ ॥ ३ ॥
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साभार ~ Manoj Kumar Bhadnai ~ 
|| श्री जगन्नाथाष्टकम् ||
कदाचित् कालिन्दी तट विपिन सङ्गीतकवरो 
मुदाभीरी नारी वदन कमला स्वाद मधुपः
रमाशम्भुब्रह्मामरपति गणेशार्च्चितपदो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥१॥
भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे
दुकूलं नेत्रान्ते सहचर-कटाक्षं विदधते ।
सदा श्रीमद्‍-वृन्दावन-वसति-लीला-परिचयो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥२॥
महाम्भोधेस्तीरे कनक रुचिरे नील शिखरे
वसन् प्रासादान्तः सहज बलभद्रेण बलिना ।
सुभद्रा मध्यस्थः सकलसुर सेवावसरदो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥३॥
कृपा पारावारः सजल जलद श्रेणिरुचिरो
रमा वाणी रामः स्फुरदमल पङ्केरुहमुखः ।
सुरेन्द्रैर् आराध्यः श्रुतिगण शिखा गीत चरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥४॥
रथारूढो गच्छन् पथि मिलित भूदेव पटलैः
स्तुति प्रादुर्भावम् प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः ।
दया सिन्धुर्बन्धुः सकल जगतां सिन्धु सुतया
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥५॥
परंब्रह्मापीड़ः कुवलय-दलोत्‍फुल्ल-नयनो
निवासी नीलाद्रौ निहित-चरणोऽनन्त-शिरसि ।
रसानन्दी राधा-सरस-वपुरालिङ्गन-सुखो
जगन्नाथः स्वामी नयन-पथगामी भवतु मे ॥६॥
न वै याचे राज्यं न च कनक माणिक्य विभवं
न याचेऽहं रम्यां सकल जन काम्यां वरवधूम् ।
सदा काले काले प्रमथ पतिना गीतचरितो
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥७॥
हर त्वं संसारं द्रुततरम् असारं सुरपते
हर त्वं पापानां विततिम् अपरां यादवपते ।
अहो दीनेऽनाथे निहित चरणो निश्चितमिदं
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥८॥
जगन्नाथाष्टकं पुन्यं यः पठेत् प्रयतः शुचिः ।
सर्वपाप विशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति ॥९॥
॥ इति श्रीमत् शंकराचार्यविरचितं जगन्नाथाष्टकं संपूर्णम् ॥
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**** भक्त परमेष्ठी दर्जी ****
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नीलाचल के नाथ के गह दृढ़ चरण गवार 
जगन्नाथ बिनु को जगत जन मन राखनहार

आज से लगभग 400 वर्ष पहले दिल्ली में परमेष्ठी नाम का काले रंग का कुबड़ा दरजी रहता था। जो भगवान का भक्त था। अपने कार्य में अति निपुण था जिस कारण बड़े बड़े अमीर, राजा, बादशाह उससे अपने वस्त्र सिलवाया करते थे। 

एक बार बादशाह के मन में दो तकिये बनवाने का विचार आया। उसने बढ़िया मखमल मंगवा कर उसपर सोने की तार से हीरे मोती जड़वाए। परमेष्ठी को बुलवा कर बादशाह ने उसे तकिये बनाने को कहा। परमेष्ठी की भक्ति के कारण बादशाह को उसकी सच्चाई और निष्ठां पर पूरा विशवास था ........

परमेष्ठी वो कपडा ले कर घर आ गया। उसने उस वस्त्र के दो गिलाफ सिले और उसमें इत्र से सुगन्धित रुई भरी। तकिये के ऊपर बने हीरे मोतियों और सोने की तारों से बने फूल पत्ते जगमगा रहे थे। सुगन्धित रुई से सारा घर सुवासित हो रहा था। परमेष्ठी के मन में आया कि इतने सुन्दर तकिये तो भगवान की सेवा में होने चाहिए। 

उस समय जगन्नाथपुरी में रथयात्रा का महोत्सव चल रहा था परमेष्ठी ने एक बार वो उत्सव देखा था। आज भाव जगत में वो एक बार पुनः रथयात्रा में पहुँच गया। वहां उसने रथयात्रा का उत्साह देखा उसने देखा कि अचानक भगवान जगन्नाथ जी के नीचे बिछा हुआ वस्त्र फट गया। पुजारी नया वस्त्र लेने गए परन्तु उसमें बहुत देर हो रही थी .....

इधर परमेष्ठी से यह सहन नहीं हो रहा था। उसने एक तकिया भगवान को भेंट कर दिया। भगवन ने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। परमेष्ठी को अत्यंत आनंद हुआ। वो नाचने लगा। वो नाचते नाचते भीड़ में पीछे रह गया। जगन्नाथ जी का दर्शन नहीं हो रहा था। परमेष्ठी व्याकुल हो गया। नेत्रों से अश्रुधार बहने लगे। उसे होश आया। और देखा कि वो घर में हैं और एक तकिया वहां नहीं है, उसे बड़ा आनंद हुआ ...

वहां जगन्नाथ जी के रथ में सचमुच ही वस्त्र फटा था और एक व्यक्ति ने सुन्दर तकिया भेंट किया था। 

परमेष्ठी आनंद में डूबा हुआ था कि बादशाह का बुलावा आ गया वो एक तकिया ले कर चला। बादशाह को बहुत पसंद आया और उसने दुसरे के बारे में पूछा तो उसने जो सच था वो बताया बादशाह को यकीन न होना स्वभाविक ही था उसने परमेष्ठी को क़ैद कर लिया वहां परमेष्ठी अपने इष्ट के ध्यान में डूबा है और भगवान उसे दर्शन देने के लिए कारागार में पहुंचे परमेष्ठी का जीवन सफल हुआ ...

उधर बादशाह को भी स्वप्न हुआ एक भयंकर पुरुष परमेष्ठी को क़ैद करने के कारण बहुत जोरों से मार रहा है सुबह बादशाह ने देखा कि उसके बदन पर पिटाई के चिन्ह स्पष्ट थे, बदन दर्द कर रहा था, उसने तुरंत परमेष्ठी को आज़ाद किया और राजसी सम्मान भी दिया परन्तु परमेष्ठी को दर्शन की प्यास थी। वो दिल्ली छोड़ कर कहीं अन्यत्र चला गया। भगवान जगन्नाथ हमें भी अपने प्रेम के योग्य बनाएं जय जगन्नाथ ! जय सुभद्रा ! जय बलभद्र !

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