सोमवार, 18 अप्रैल 2016

= ज्ञानसमुद्र(तृ. उ. ८९-९०) =

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🌷🙏🇮🇳 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🇮🇳🙏🌷
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स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - श्रीसुन्दर ग्रंथावली 
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान, 
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*= ज्ञानसमुद्र ग्रन्थ ~ तृतीय उल्लास =*
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*नहिं देव दैत्य पिशाच राक्षस,*
*भूत प्रेत न संचरै ।* 
*नहिं पवन पानी अग्नि भय पुनि,*
*सर्प सिंहहिं ना डरै ॥*
*नहिं यंत्र मंत्र न शस्त्र लागहिं,*
*यह अवस्था गानिये२ ।* 
*कछु भिन्न भाव रहै न कोऊ,*
*सा समाधि बखांनिये ॥८९॥*
{(२. योग की एक सिद्धि ऐसी भी वर्णन की गयी है जिसमें शरीर पर शस्त्र आदि का आघात या किसी मन्त्रादि का प्रभाव नहीं हो सकता । जैसे-
‘‘अभेद्य: सर्वशस्त्रामवध्य: सर्वदेहिनाम् । 
अग्राह्यो मन्त्रयन्त्राणां योगी मुक्त: समाधिना’’ ॥ इत्यादि । 
(गोरक्ष० २।८९-९०) तथा ‘‘रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसम्पत्’’ (योगसूत्र ३।४६)}
उस समय (समाधि-अवस्था में) योगी को किसी देव का या दैत्य का, पिशाच का या राक्षस का, भूत का या प्रेत का कोई भय नहीं रहता । न उसे वायु का, न जल का, न अग्नि का, न सर्प का, न सिंह का डर रहता है । इसी तरह न उसे किसी यन्त्र की, न मन्त्र की, न शस्त्र की चोट लग सकती है । न उनका असर पड सकता है; क्योंकि उस समय वह योगा ब्रह्म से तादात्म्य सम्बन्ध कर चुका होता है । और योग शास्त्रोक्त कायसम्पतियुक्त अवस्था को ही १समाधि-अवस्था कहते हैं ॥८९॥
(१- श्रीसुन्दरदासजी का यह समाधिवर्णन ‘‘हठयोगप्रदीपिका’’ ‘‘गोरक्षसंहिता’’ आदि योगग्रन्थों से प्रमाणित है, तथा उनका निज का अनुभव किया हुआ है - ऐसा प्रतीत होता है ।)
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*दोहा*
*योग सिद्धांत सुनाइयौ, अष्ट अंग संयुक्त ।* 
*या साधन ब्रह्महि मिलै, तेऊ कहिये मुक्त ॥९०॥*
इति श्रीसुन्दरदासेन विरचिते ज्ञानसमुद्रे अष्टांगयोग सिद्धान्त निरुपणं नाम त्रितीयोल्लास: ॥३॥
इस तरह हे शिष्य ! मैंने तुझको आठ अंगों से युक्त योग का सिद्धांत रूप से वर्णन कर दिया । इस(अष्टांगयोगयुक्त) साधन के अभ्यास से जीवब्रह्म से मिल सकता है । उस जीव-ब्रह्मैक्यावस्था को ही मुक्तावस्था कहते हैं ॥९०॥
श्री सुन्दरदासजी कृत ज्ञानसमुद्र ग्रन्थ  में अष्टांगयोग सिद्धांत निरुपण नामक तृतीय उल्लास समाप्त: 
(क्रमशः)

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