शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

= विरह का अंग =(३/१२४-६)

॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
**श्री दादू अनुभव वाणी** टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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**= विरह का अँग ३ =**
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विरही सिसकै पीड़ सौं, ज्यों घायल रण मांहि ।
प्रीतम मारे बाण भर, दादू जीवै नांहि ॥१२४॥
जैसे रण में घायल हुआ वीर सिसकता है, वैसे ही विरही विरह - व्यथासे व्याकुल रहता है । प्रियतम प्रभु अपनी शक्ति भर उसके विरह - बाण मारते हैं किन्तु यह भगवद् - साक्षात्कार बिना विषय - सुखों से सुखी होकर जीवित नहीं रह सकता ।
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दादू विरह जगावे दरद को, दरद जगावे जीव ।
जीव जगावे सुरति को, पंच पुकारें पीव ॥१२५॥
भगवद् - वियोग का अनुभव होने पर उसकी प्राप्ति के लिए व्यथा होने लगती है । उस व्यथा से व्यथित होकर जीव मोह - निद्रा से जाग जाता है और अपनी चित्तवृत्ति को विषयाकार स्थिति रूप निद्रा से उठाकर भगवदाकार ही रखने लगता है । तब पंच ज्ञानेन्द्रियाँ भी भगवत् - परायण होकर उसी को पुकारने लगती हैं अर्थात उसी का दर्शन, शब्द, भंध, स्पर्श और रस चाहती हैं ।
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दादू मारे प्रेम सौं, बेधे साधु सुजाण ।
मारणहारे को मिले, दादू विरही बाण ॥१२६॥
अन्य वीर द्वेष पूर्वक लक्ष्य को सिद्ध करते हैं और उनका अस्त्र लक्ष्य को नष्ट करके यहीं गिर पड़ता है या मंत्र सिद्ध हो तो स्वयं वीर के पास लौट आता है, किन्तु भगवन् अपने बुद्धिमान् साधक संत - लक्ष्य को प्रेम पूर्वक विरह - बाण से युक्त करते हैं और यह बाण लक्ष्य को बेधकर लक्ष्य के सहित भगवन् में ही आ मिलता है अर्थात साधक, साधन और साध्य एक रूप हो जाते हैं ।
(क्रमशः)

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