🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏🌷
*https://www.facebook.com/DADUVANI*
*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८१ =*
*= प्रीतम द्विज को उपदेश =*
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तूं है तूं है तूं है तेरा,
मैं नहिं मैं नहिं मैं नहिं मेरा ॥टेक॥
तूं है तेरा जगत उपाया,
मैं मैं मेरा धंधे लाया ॥१॥
तूं है तेरा खेल पसारा,
मैं मैं मेरा कहै गंवारा ॥२॥
तूं है तेरा सब संसारा,
मैं मैं तिन शिर भारा ॥३॥
तूं है तेरा काल न खाय,
मैं मैं मेरा मर मर जाय ॥४॥
तूं है तेरा रह्या समय,
मैं मैं मेरा गया विलाय ॥५॥
तूं है तेरा तुम हीं मांहिं,
मैं मैं मेरा मैं कुछ नांहिं ॥६॥
तूं है तेरा तू ही होय,
मैं मैं मेरा मिला न कोय ॥७॥
तूं है तेरा लंघै पार,
दादू पाया ज्ञान विचार ॥८॥
संत मन, वचन कर्म से कहते हैं - हे परमेश्वर ! आप ही सत्य हैं और सब कुछ आपका ही है । प्राणियों का कायिक, वाचिक, मानसिक 'मैं' तथा मेरा रूप अहंकार सत्य नहीं है । आप ही समर्थ हैं, आपका ही उत्पन्न किया हुआ यह जगत् है । "मैं युवा हूँ, मैं बली हूँ, शरीर मेरा है । " इस प्रकार अहंकार करने वालों को आपने संसार के धंधों में लगा रक्खा है ।
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आप ही अद्भुत रचना में निपुण है । आपका ही यह संसार खेल फैलाया हुआ है । मैं रचना में निपुण हूँ, मैं और मेरा कार्य अद्भुत है । यह धन मेरा है, ऐसा अज्ञानी लोग ही कहते हैं ।
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आप सदा स्थायी हैं, सब संसार आपका ही है । मैं स्थायी रहूँगा, मैं महान् हूँ, यह ऐश्वर्य मेरा है, ऐसा कहने वालों के शिर पर पाप भार ही पड़ता है । आप नित्य हैं और जो आपका भक्त है, उसे भी काल नहीं खाता है । मैं चिरजीवी हूँ, अजय हूँ, यह दुर्ग मेरा है, ऐसा अहंकार करने वाले मर मर कर चौरासी में ही जाते हैं ।
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आप ही अखंड हैं, आपका ज्ञानी भक्त भी आप में ही समाकर रहता है । मैं गुणी हूँ, मैं धनी हूँ, यह मेरा परिवार है, ऐसा कहने वाले मिट्टी में मिल गये हैं । आप ही शुद्ध हैं, आपका ज्ञानी भक्त भी आप में संलग्न रहता है । मैं राजा हूँ, मैं वीर हूँ, मेरा देश है, ऐसा कहने वालों का कुछ भी नहीं होता है । आप ही व्यापक हैं, आपका ज्ञानी भक्त भी आपका ही रूप हो जाता है ।
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मैं कुलवान् हूँ, मैं विद्वान हूँ, यह सब पसारा मेरा है, ऐसा अहंकार करने वाला आप में कोई भी नहीं मिल सका है । आप माया से परे हैं और आपका ज्ञानी भक्त भी मायिक मोह को लांघकर, संसार के पार जा, आप ही में लय होता है, विचारादि साधन द्वारा हमने यह यथार्थ ज्ञान प्राप्त किया है ।
(क्रमशः)
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*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८१ =*
*= प्रीतम द्विज को उपदेश =*
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तूं है तूं है तूं है तेरा,
मैं नहिं मैं नहिं मैं नहिं मेरा ॥टेक॥
तूं है तेरा जगत उपाया,
मैं मैं मेरा धंधे लाया ॥१॥
तूं है तेरा खेल पसारा,
मैं मैं मेरा कहै गंवारा ॥२॥
तूं है तेरा सब संसारा,
मैं मैं तिन शिर भारा ॥३॥
तूं है तेरा काल न खाय,
मैं मैं मेरा मर मर जाय ॥४॥
तूं है तेरा रह्या समय,
मैं मैं मेरा गया विलाय ॥५॥
तूं है तेरा तुम हीं मांहिं,
मैं मैं मेरा मैं कुछ नांहिं ॥६॥
तूं है तेरा तू ही होय,
मैं मैं मेरा मिला न कोय ॥७॥
तूं है तेरा लंघै पार,
दादू पाया ज्ञान विचार ॥८॥
संत मन, वचन कर्म से कहते हैं - हे परमेश्वर ! आप ही सत्य हैं और सब कुछ आपका ही है । प्राणियों का कायिक, वाचिक, मानसिक 'मैं' तथा मेरा रूप अहंकार सत्य नहीं है । आप ही समर्थ हैं, आपका ही उत्पन्न किया हुआ यह जगत् है । "मैं युवा हूँ, मैं बली हूँ, शरीर मेरा है । " इस प्रकार अहंकार करने वालों को आपने संसार के धंधों में लगा रक्खा है ।
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आप ही अद्भुत रचना में निपुण है । आपका ही यह संसार खेल फैलाया हुआ है । मैं रचना में निपुण हूँ, मैं और मेरा कार्य अद्भुत है । यह धन मेरा है, ऐसा अज्ञानी लोग ही कहते हैं ।
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आप सदा स्थायी हैं, सब संसार आपका ही है । मैं स्थायी रहूँगा, मैं महान् हूँ, यह ऐश्वर्य मेरा है, ऐसा कहने वालों के शिर पर पाप भार ही पड़ता है । आप नित्य हैं और जो आपका भक्त है, उसे भी काल नहीं खाता है । मैं चिरजीवी हूँ, अजय हूँ, यह दुर्ग मेरा है, ऐसा अहंकार करने वाले मर मर कर चौरासी में ही जाते हैं ।
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आप ही अखंड हैं, आपका ज्ञानी भक्त भी आप में ही समाकर रहता है । मैं गुणी हूँ, मैं धनी हूँ, यह मेरा परिवार है, ऐसा कहने वाले मिट्टी में मिल गये हैं । आप ही शुद्ध हैं, आपका ज्ञानी भक्त भी आप में संलग्न रहता है । मैं राजा हूँ, मैं वीर हूँ, मेरा देश है, ऐसा कहने वालों का कुछ भी नहीं होता है । आप ही व्यापक हैं, आपका ज्ञानी भक्त भी आपका ही रूप हो जाता है ।
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मैं कुलवान् हूँ, मैं विद्वान हूँ, यह सब पसारा मेरा है, ऐसा अहंकार करने वाला आप में कोई भी नहीं मिल सका है । आप माया से परे हैं और आपका ज्ञानी भक्त भी मायिक मोह को लांघकर, संसार के पार जा, आप ही में लय होता है, विचारादि साधन द्वारा हमने यह यथार्थ ज्ञान प्राप्त किया है ।
(क्रमशः)
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