गुरुवार, 14 जुलाई 2016

= सर्वांगयोगप्रदीपिका(प्र.उ. २३/४) =


🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका१(ग्रन्थ२) ~ प्रथम उपदेश*
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*केचित् गुटिका सिद्ध कमावैं ।*
*बनस्पति के पात चरावैं ॥*
*केचित् खड्ग अग्नि जल बांधैं ।*
*सिला उठाइ धरहिं पुनि कांधे ॥२३॥*
कुछ धूर्त लोग नाना प्रकार की अन्य गुटिकाओं(गोलियों) के प्रयोग से सिद्धि का ढोंग बघारते रहते हैं । कुछ लोग मन्त्र-शक्ति के बल पर तलवार की धार को बाँधना, जल को बाँधना, अग्नि को शीतल कर देना आदि सिद्धियों की डींग मारते हैं । कुछ धूर्त लोग दुनिया को ठगने के लिये मन्त्रबल से अपने कन्धे पर भारी वजनी पत्थर रखकर जीवन भर घूमते रहते हैं और इसी में मोक्ष मानते हैं ॥२३॥
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*केचित् करहिं बिबिधि बैदंगा ।*
*बूँटी जरी टटोर हि अंगा ॥*
*केचित् ज्योतिस गण तिथि वारा ।*
*घरी महूर्त ग्रह व्यौहारा ॥२४॥* 
कुछ आचार्य वैद्यक(चिकित्सा-शास्त्र) से ही मोक्ष प्राप्ति मानते हैं और जीवन भर जडी-बूँटी उखाड़ने और आदमियों की नब्ज(नाड़ी) टटोलने तथा उनके शरीर के अंग-प्रत्यंग देखने में ही अमूल्य जीवन बिता देते हैं । कुछ लोग ज्योतिष का धन्धा अपनाकर उससे ग्रह-सञ्चालन, उनका घडी मुहूर्त का प्रभाव बता-बताकर दुनिया को ठगने में ही मोक्ष मानते हैं ॥२४॥ 
(क्रमशः)

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