卐 सत्यराम सा 卐
पूर रह्या परमेश्वर मेरा,
अणमांग्या देवै बहु तेरा ॥ टेक ॥
सिरजनहार सहज में देइ,
तो काहे धाइ माँग जन लेइ ॥ १ ॥
विश्वंभर सब जग को पूरै,
उदर काज नर काहे झूरै ॥ २ ॥
पूरक पूरा है गोपाल,
सबकी चिंत करै दरहाल ॥ ३ ॥
समर्थ सोई है जगन्नाथ,
दादू देख रहे संग साथ ॥ ४ ॥
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साभार ~ राजेश वशिष्ठ
शुभ प्रभातम प्रिय मित्रो, आप का रविवार प्रकाशमय हो, मित्रो जहा प्रेम उच्तम स्थर पे होता हैं, वह भक्ति प्रगट होती हैं, भक्ति का अर्थ हैं, अस्तित्व के प्रति एकरूपता, अब न कोई इच्छा शेष हैं, न कोई मांग। भक्ति का अर्थ हैं स्वम् में ठहराव की एक अवस्था जहा एक संवाद चलता हैं, मोन संवाद भक्त और भगवान के मध्य जो संवाद चलता है, अनूठा है। भक्त मांगता नहीँ और भगवान बरसाए चला जाता है, भक्त ने मांगा कि संवाद रुक जाता है। मांगा कि नाता छिन्न-भिन्न हो गया। सेतु गिर गया। क्योँकि मांग ये बताती है कि उत्सुकता परमात्मा मे नहीँ, धन मे है, पद मे है, प्रतिष्ठा मे है। परमात्मा तो माध्यम मात्र है, धन मिल जाए; इसीलिये प्रार्थना की जा रही है, असली इच्छा धन की है।
धन भगवान से बड़ा हो गया और भगवान साधन, धन साध्य हो गया। मांगना परमात्मा का अपमान करना है। प्रार्थना मे यदि मांग है तो परमात्मा का अपमान किया जा रहा है। मनुष्य की प्रार्थनाएं पूरी क्योँ नहीँ होती? प्रार्थनाएं मनुष्य की परमात्मा तक पहुंच ही नहीँ सकती, वे प्रार्थनाएं नहीँ हैँ; अपमान है, क्योँकि जब भी कुछ मांगा तभी ये बता दिया कि परमात्मा से महत्वपूर्ण कुछ और है, जिसके लिये परमात्मा को साधन बनाया जा रहा है। मनुष्य प्रार्थना ही इसीलिये करता है कि आकांक्षाएं उसकी पूरी हो सकेँ, उसे परमात्मा से इसके अतिरिक्त और कोई प्रयोजन नहीँ है। मनुष्य को अपनी आकांक्षा से प्रयोजन है, परमात्मा का तो वह उपयोग कर रहा है। भक्त इसीलिये मांगता नहीँ। बिना मांगे उसे मिलता है।

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