शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

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卐 सत्यराम सा 卐
एता कीजे, आप थैं, तन मन उनमन लाइ ।
पंच समाधी राखिये, दूजा सहज सुभाइ ॥ 
दादू जीव जंजालों पड़ गया, उलझ्या नौ मण सूत ।
कोई इक सुलझे सावधान, गुरु बाइक अवधूत ॥ 
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साभार ~ गुंजेश त्रिपाठी द्वारा चैतन्य राजेश शर्मा 
विधि का विधान ~


नश्वर से मोह साधक के मार्ग का एक बहुत बड़ा मनोविकार है। मोह जड़ता का प्रतीक है, जो विवेक को जाग्रत नहीं होने देता। कोई भी साधक जब तक किसी भी प्रकार के मोह विकार से ग्रस्त रहेगा, वह साधना में नहीं उतर सकता। साधना निर्विकार की परिणति है। जब विचार गिर जाए, मोह की दीवार ढह जाए, तभी साधक को साधना की अनुभूति होती है। परमात्मा ने मनुष्य को निर्विकार, सरल और सौम्य जीवन जीने के लिए उत्पन्न किया, लेकिन हमने स्वयं अपने चारों ओर मोह और ममता का मायाजाल निर्मित कर स्वयं को फंसा लिया। जितना दुख चिंता और भय हमने अपने जीवन में आमंत्रण देकर बुलाया है, वे सब हमारी अपनी कल्पना के फल हैं। ईश्वर ने हमारे लिए कोई जाल नहीं बनाया, हमने स्वयं अपने हाथों से उन जालों को बनाया और स्वयं उसमें फंसते गए। आज के परिप्रेक्ष में इस मोह का मायाजाल व्यक्ति की अपनी मानसिक रुग्णता का परिणाम है। जिस प्रकार रस्सी को सांप समझकर हम भागने लगते हैं और बाद में वस्तुस्थिति समझकर अपनी ही मूर्खता पर मुस्कराने लगते हैं, ठीक वही स्थिति मनुष्य की होती है, जो अकारण किसी वस्तु से मोहग्रस्त हो जाता है और फिर पछताने लगता है। मोह के कारण जिस वस्तु से उसे लगाव हो जाता है, बाद में वही वस्तु कांटे की तरह चुभने लगती है। ऐसी स्थिति में देर अबेर मनुष्य पाता दुख ही है। परमात्मा भी इसमें दखल नहीं दे सकता क्योंकि यही तो विधि का विधान कहलाता है।

नश्वर से लगाव मोह की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। मोह अभाव से उत्पन्न होता है और अभाव का अर्थ है कि व्यक्ति भीतर से खाली है। भीतर जो खाली है, व्यक्ति के भीतर के आकाश में खोखलापन है, तो वह भीतर के अभाव को भरने के लिए बाहर नश्वर के मोह में पागल सरीखा हो जाता है। भीतर का अभाव ही बाहर से भरने की उत्सुकता पैदा कर देता है। इसीलिए लोग नश्वर के मोह में फंसे रहते हैं और दुखों का संकलन करते रहते हैं वर्तमान के लिए भी और आने वाले कल के लिए भी

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