शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

= विन्दु (२)८० =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८० =*
*= दादूजी का करड़ाले पधारना =*
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फिर दादूजी महाराज जब करड़ाले जाने लगे तब राघवदासजी तथा अन्य सब भक्तों ने सत्यराम बोलकर प्रणाम किया और कहा - स्वामीजी महाराज ! आप अपनी दया हम लोगों पर सदा ही बनाये रखना ।
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फिर दादूजी महाराज ने भी अपने मधुर वचनों से सबको संतुष्ट करके पीथा निर्वाण के साथ करड़ाला को प्रस्थान किया । करड़ाले पहुँचने पर पीथा निर्वाण के भाई हरिदास को भी अति आनन्द हुआ । अन्य भक्त लोग अति प्रसन्न हुये । पीथा और हरिदास आदि ने संत सेवा में महान् शोर्य दिखाया अर्थात् लोक लाज को त्यागकर अच्छी सेवा की ।
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*= पीथा को सत्य शिक्षा =*
वैसे तो दादूजी सदा भिक्षान्न ही पाते थे और मारवाड़ में प्रायः पांच तोले बाजरा का दलिया पाया करते थे, किंतु एक दिन पीथा निर्वाण ने अपने घर पर ही भोजन कराने का विशेष आग्रह किया तब दादूजी ने भी स्वीकार कर लिया । फिर घर पर ही शीघ्रता से अच्छा भोजन बनवाया गया । उसके घर दादूजी पधारे ।
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दादूजी के सामने चौकी पर भोजन का थाल रक्खा गया तब उसे देख कर दादूजी ने कहा - यह भोजन तो चोरी के पैसों से बना हुआ है । चोरी का अन्न हम नहीं खाते । हम तो राम प्रीति वाले का ही खाते हैं अर्थात् अपनी सच्ची कमाई का और रामजी के प्रेमी का प्रेम पूर्वक दिया हुआ ही पाते हैं । यह राम प्रीति युक्त का नहीं हैं । अतः हम नहीं पायेंगे ।
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तब उस समय पीथा निर्वाण ने कहा - भगवन् ! मैं तो सर्प के मुख से निकालकर गो के मुख में डालता हूं अर्थात् घींघोली की घाटी से जाने वाले श्रीमानों को घाटी में लूटकर फिर साधु, ब्राह्मण, गरीबों को खिलाता हूँ पीथा की उक्त बात सुनकर दादूजी ने कहा - तब तो तुम दो पाप करते हो । पीथा ने पूछा - कैसे ?
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दादूजी ने कहा - सर्प मरे बिना तो अपने मुख का देगा नहीं । इस से पहले तो सर्प मारने का पाप करते हो, फिर सर्प के मुख से निकाला हुआ विष मिश्रित होता है । उससे गाय को भी हानि ही होती है अर्थात् श्रीमान् भी तुम को प्रसन्नता से तो देते नहीं हैं । उनको तुम डराते हो तब ही वे दुःखी होकर तुम को देते हैं ।
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इससे एक पाप तो उनको दुःखी करने का करते हो फिर संतों को खिलाते हो तब उस पाप कर्म से प्राप्त किये हुये पैसे से बनवाया हुआ भोजन संतों के साधन-भजन में विघ्न करता है, मन को शांत नहीं रहने देता । अतः दूसरा पाप संतों के भजन में विघ्न डालना रूप करते हो । इससे तुम्हारा जन्म तो व्यर्थ ही जाता है ।
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दादूजी की उक्त सत्य शिक्षा सुनकर पीथा ने विचार किया । स्वामीजी ने तो सत्य ही कहा है - सच्चे संत कोई भी बात कहते हैं, वह प्राणों के हित में रत्त होकर ही कहते हैं । अपने स्वार्थ के लिये नहीं कहते । ऐसा विचार करके अपने पूर्व किये धाड़ा चोरी आदि कार्य करने के लिये पश्चात्ताप करके दादूजी के आगे चोरी चोरी छोड़ने का संकल्प कर लिया । और चोरी छोड़ कर अपने को दादूजी का शिष्य बताने लगा ।
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जब मन, वचन, कर्म से चोरी नहीं करने का दृढ़ नियम पीथा ने ले लिया तब फिर अन्य शुद्ध कमाई का भोजन बनवाया गया फिर दादूजी ने उसका भोजन पाया । इस प्रकार अन्तर्यामी स्वामी दादूदयालुजी ने सब के सुख के लिये पीथा निर्वाण के हृदय में भगवान् की भक्ति और भाव को दृढ़ कराया । इससे उसका आतंक मिटकर सबको सुख ही हुआ ।
(क्रमशः)

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