॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
"श्री दादू अनुभव वाणी" टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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= विरह का अँग ३ =
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चंदन शीतल चन्द्रमा, जल शीतल सब कोइ ।
दादू विरही राम का, इन सौं कदे न होइ ॥९४॥
चन्दन, चन्द्रमा और जल के शीतादि गुणों से सर्प, चकोर तथा मीनादि सभी को शांति प्राप्त होती है, किन्तु हम राम के विरही जनों को राम दर्शन बिना इन चन्दनादि सांसारिक पदार्थों से सुख कभी न हो सकेगा ।
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विरही - विरह - लक्षण
दादू घाइल दर्दवंद, अंतर करे पुकार ।
साँई सुने सब लोक में, दादू यहु अधिकार ॥९५॥
९५ - ९६ में विरही तथा विरह के लक्षण कह रहे हैं - विरही विरह - बाणाघात से घायल होकर दु:खी रहते हैं और प्रभु के दर्शनार्थ आन्तर हृदय में निरंतर पुकारते रहते हैं । कारण, प्रभु व्यापक होने से सभी लोकों में सभी की आन्तर पुकार सुन लेते हैं । मेरा भी यही अधिकार है कि प्रभु को पुकारता ही रहूं ।
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दादू जागे जगत - गुरु, जग सगला सोवे ।
विरही जागे पीड़ सौं, जे घाइल होवे ॥९६॥
इस संसार में अज्ञान - निद्रा से सर्वथा मुक्त होकर तो एक जगद्गुरु परमात्मा ही जागता है और जो भगवद् - विरह - बाण से युक्त होकर घायल हो रहे हैं, वे उस पीड़ा के कारण जागते हैं । अन्य भगवद् - विमुख सारा संसार मोह - निद्रा में प्रसुप्त है ।
(क्रमशः)

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