卐 सत्यराम सा 卐
दादू पाणी मांहीं पैसि करि, देखै दृष्टि उघारि ।
जलाबिंब सब भरि रह्या, ऐसा ब्रह्म विचारि ॥
सदा लीन आनन्द में, सहज रूप सब ठौर ।
दादू देखै एक को, दूजा नाहीं और ॥
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साभार ~ Ramjibhai Jotaniya
दास्यभक्ति का एक अनूठा रूप संत जनाबाई
भारत के महाराष्ट्र भूमि ने अनेक महान संतों को जन्म दिया है । इसमें जैसे पुरुष संत हैं, वैसे अनेक महान स्त्री संत भी हैं । इसी परंपरा में संत जनाबाई का परिचय ‘नामया की दासी’ अर्थात् संतनामदेवजी की दासी के रूप में प्रसिद्ध है । संत जनाबाई को महाराष्ट्र एक कवयित्री के रूप में भी जानता है । उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से दास्यभक्ति, वात्सल्यभाव, योगमार्ग, इनके साथ-साथ धर्मरक्षा के लिए हुए अवतारों का कार्य भी वर्णित किया है । विशेष बात ये है कि, ११ वें शतक में एक स्त्री होकर और ६-७ वर्ष की आयु से ही दूसरे के घर की दासी होकर इन्होंने अपने काव्य से जो सामान्यजन को मार्गदर्शन किया है, वैसे विचार आज की, स्वयं को स्वतंत्र माननेवाली सुशिक्षित स्त्री अपनी कल्पना में भी नहीं कर सकती । संत जनाबाई ने जो मार्गदर्शन किया है वह अपनी आत्मानुभूति के बलपर किया है; इसलिए वह काल की कसौटी पर आज भी खरा उतरता है । आइए, इनके चरणों में प्रणाम कर, इनके मार्गदर्शनानुसार हम भी साधना करें तथा भगवान के भक्त बनें ।
बालपन
जनाबाई का जन्म महाराष्ट्र के मराठवाडा प्रदेश में परभणी मंडल के गांव गंगाखेड में ‘दमा’ और उनकी पत्नी ‘करुंड’ नामके शूद्र जाति के विठ्ठल भक्त के घर में हुआ । उनके पिता ने पत्नी के निधन के उपरांत जनाबाई को पंढरपुर के विठ्ठल भक्त ‘दामाशेटी’ के हाथों में सौंप दिया और स्वयं भी संसार से विदा ली । इस प्रकार ६-७ वर्ष की आयुमें ही जनाबाई अनाथ होकर दामाशेटी के घरमें दासी के रूपमें रहने लगीं । उनके घर में आने के उपरांत दामाशेटी को पुत्ररत्न प्राप्त हुआ, वही प्रसिद्ध संत नामदेव महाराज थे ! आजीवन जनाबाई ने उन्हीं की सेवा की ।
गुरुप्राप्ति
संत नामदेव महाराज के सत्संग से ही जनाबाई को भी विठ्ठल भक्ति की आस लगी । घरके कार्य-काज करते समय वह नाम जप करने लगी । कुछ दिनों में उनका नामजप निरंतर होने लगा । संत नामदेव महाराज ने उनको अपनी शिष्या स्विकार किया; परंतु जनाबाई स्वयं का उल्लेख कभी भी शिष्या न करते हुए, केवल उनकी दासी मात्र ही मानती हैं । श्री संत ज्ञानदेव-विसोबा खेचर-संत नामदेव-संत जनाबाई यह उनकी गुरुपरंपरा है । संत ज्ञानेश्वर महाराज के प्रति उनका भक्तिभाव अनन्यसाधारण था ।
काव्य रचना
संत जनाबाई की भावकविता भगवंत की प्रीति से ओतप्रोत है । संत जनाबाई के नामपर लगभग ३५० अभंग(छोटी कविता) सकल संत गाथा में मुद्रित है । इसके अतिरिक्त कृष्णजन्म, बालक्रीडा, दशावतार, प्रल्हादचरित्र, हरिश्चंद्राख्यान, द्रौपदीवस्त्रहरण ऐसी आख्यान रचना, तथा काकड आरती(भोर के समयमें की जानेवाली भगवानकी स्तुति), भारूड(कथा), पद, पाळना(लोरी) आदि रचनाएं भी उन्होंने की हैं । संत जनाबाई के द्रौपदी स्वयंवर इन भावमधुर आख्यानों से ही महाकवि मुक्तेश्वरजी को(संत एकनाथ महाराजके पौत्र) स्फूर्ति मिली । तत्कालीन संत ज्ञानेश्वर महाराज, संत नामदेव महाराज, संत सोपानका का, संत गोरोबाका का, संत चोखोबा, संत सेना महाराज आदि संतों के जीवन पर पद्यरचना करके संत जनाबाई ने आनेवाली पीढियों पर महान उपकार किए हैं । उनकी रचनाओं से समाजको ज्ञात होता है कि साधकों का रक्षण तथा दुर्जनोंका विनाश कर धर्म संस्थापना करने के हेतु भगवान अवतार धारण करते हैं । उनकी भाषा सर्वसामान्य लोगों के हृदय को छू लेती है । महाराष्ट्र के गांव-गांव में स्त्रियां चक्की पीसते हुए, ओखली में धान कूटते हुए उन्हीं की रचनाएं गाती हैं ।
साधना
गुरु के प्रति उनका भक्ति-प्रेमभाव तथा कृतज्ञता-भाव उनके एक अभंग में व्यक्त हुआ है । विवाह के लिए वर जब वधू के घर आता है तो, उसके साथ आनेवाले बारातियों को अनायास ही मिष्टान्न तथा मान सम्मानका लाभ मिलता है । पारस पत्थरके स्पर्श होने से लोहे को सुवर्णरूप प्राप्त होता है, जिससे धनवान लोगों को उससे आभूषण प्राप्त होते हैं । उसी प्रकार संत नामदेवजी ने मुझे शिष्य अर्थात् दासी के रूपमें स्वीकार करने के कारण मुझे विठ्ठल प्राप्ति हुई है । वात्सल्य, कोमलता, ऋजुता, त्यागी वृत्ति, भावसघनता, सहनशीलता, समर्पण वृत्ति, इन स्त्री विषयक गुणों को तथा सभी भावनाओं को उन्होंने अपने निरंतर प्रयासों से विठ्ठल के प्रति भाव में परावर्तित किया । पूर्ण निष्काम होकर लौकिक, ऐहिक भावनाओं से मुक्त होकर, उन्होंने विठ्ठल के श्री चरणोंमें शरण ली । सगुण-साकार उपासना से धिरे-धिरे निर्गुण की उपासना की ओर अग्रसर होते-होते एक दिन उन्हें आत्मज्ञान का साक्षात्कार भी हुआ ।
भावावस्था
संत जनाबाई विठ्ठलको कभी अपनी माता, कभी पिता, कभी पुत्र तो कभी सखा मानती थीं अर्थात् मनकी स्थिति कैसी भी हो, प्रत्येक प्रसंगमें वह विठ्ठलके स्मरणमें रहती थीं । घरमें कुल सदस्य संख्या १५ थी । वे दासी होनेके कारण प्रायः घरके सभी काम उन्हींको करने पडते थे, उदा :- कपडे धोना, पात्र(बरतन) स्वच्छता, नदीसे पानी लाना, चक्की पीसना, धान कूटना, झाडू लगाना, घर, आंगन की लीपा-पोती करना, रंगोली सजाना, नगर से बाहर जाकर कंडे, लकडियां ढूंढकर लाना ऐसे बहुत सारे काम उन्हें करने पडते थे; परंतु विठ्ठल प्रायः उनके सभी कामों में उनकी सहायता करते थे । इतना ही नहीं विठ्ठल जनाबाईजी के केशों को माखन लगाकर उन्हें नहलाते, केश संवारकर कभी जूडा तो कभी चोटी बनाकर उनका शृंगार भी करते हैं । साथ ही विठ्ठल प्रतिदिन रात में उनसे बातें करने आते थे और दोनो वार्तालाप में तन्मय हो जाते; परंतु एक दिन बात करते करते विठ्ठलजी को निद्रा आ गई; परंतु समयपर जागृत ना होनेसे जनाबाई ने उन्हें जगाया ।
विलंब होनके कारण हडबडी में विठ्ठल अपना उपरणा तथा आभूषण वहीं भूलकर जनाबाई की चादर ओढकर दौडे-दौडे मंदिर में जाकर खडे हो गए। इतने में पूजा करनेवाले ब्राह्मण आए और उन्होंने देखा कि भगवान विठ्ठल के अंगपर आभूषण तथा उपरणा न होकर एक फटी हुई चादर है । ब्राह्मणों को लगा कि चोरी हुई है । राजा को वार्ता पहुंचायी गई । पूछ-ताछ करनेपर ज्ञात हुआ कि वह फटी हुई चादर जनाबाई की है । लोग उनको चोर सम्बोधित कर पीटने लगे । जनाबाई विठ्ठल की दुहाई देने लगीं; परंतु विठ्ठल के न आनेपर जनाबाई को बडा क्रोध आया । राजा ने जनाबाई को सूलीपर चढाने का आदेश दिया । राजाज्ञा के अनुसार चंद्रभागा नदी तटपर सूली की सब सिद्धता हो गयी । उन्हें अंतिम इच्छा पूछी तो, जनाबाई ने विठ्ठल के दर्शन की आस बतायी । उन्हें दर्शन के लिए मंदिर ले जाया गया । वहां विठ्ठल रुआंसा मुख लेकर खडे हैं यह देखकर उनका वात्सल्यभाव जागृत हुआ और उन्होंने बडी वत्सलता से कहा ‘‘विठ्ठला ! तुम्हें मेरे कारण बडे श्रम उठाने पडे, मुझसे बहुत अपराध हुए, मुझे क्षमा कर दो, कहते कहते उनके नेत्र भर आएं और विठ्ठल के गलेसे लिपटकर अपने पल्लू से विठ्ठल का मुख पोछते हुए जनाबाई उसको ही सांत्वना देने लगी कि ‘मेरे जीवनाधार तुम दुःखी ना हो ।’ वहांसे सब लोग चंद्रभागा नदी तटपर आए ।
जनाबाई ने नदीमें स्नान किया । भक्त पुंडलीक के मंदिर में जाकर दर्शन किए और वे सूल के सामने खडी होते ही, उस सूलका रूपांतर एकाएक चंपकके फूलोंसे हरे-भरे वृक्षमें हुआ, सब लोग आश्चर्य से देखने लगे, तभी वृक्षका भी पानी हो गया । सभी लोगों ने जनाबाई का जयजयकार किया । उन्हें जब ब्रह्मज्ञान प्राप्त हुआ तो सर्वत्र विठ्ठल ही दिखाई देने लगा । अपनी इसी अवस्था का वह वर्णन इस प्रकार करती हैं कि अन्नरूप तथा जलरूप ब्रह्म का सेवन करती हूं, शय्यारूप ब्रह्म पर निद्रा लेती हूं । जीवनरूपी ब्रह्म से व्यवहार करती हूं, इस व्यवहार में मैं सबसे ब्रह्म लेती हूं और केवल ब्रह्म ही देती हूं । यहां-वहां चहुं ओर ब्रह्म देखती हूं, पूरे संसार में ब्रह्म नहीं ऐसा कुछ भी नहीं । अब तो मैं सबाह्यअंतरी ब्रह्म ही हो गयी । उन्होंने अपने उदाहरण से समस्त संसार को दिखा दिया कि ईश्वर प्राप्ति के लिए कर्मकांड, धन-संपत्ति की, घर-संसार का त्याग करने की अथवा किसी भी आडंबर की आवश्यकता ना होकर केवल भगवान के प्रति शुद्ध भाव होना ही आवश्यक है ।
इस महान संत कवयित्री जनाबाई ने श्रीक्षेत्र पंढरपुर के महाद्वार में आषाढ कृष्ण त्रयोदशी संवत १२७२ को समाधि ली तथा विठ्ठल भगवान में विलीन हो गर्इं ।

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