शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

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卐 सत्यराम सा 卐
मूवाँ पीछे पद पहुँचावैं, मूवाँ पीछे तारैं ।
मूवाँ पीछे सद्गति होवै, दादू जीवित मारैं ॥ 
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साभार ~ गुंजेश त्रिपाठी

एक बार श्राद्ध के दिनों में एक व्यक्ति ने अपने पुत्र से कहा आज श्राद्ध का दिन है और पितरों के लिये खीर बनानी है । तुम जाओ और पितरों की खीर के लिये दूध ले आओ ।

पुत्र की उम्र उस समय 9 वर्ष की ही थी । पुत्र दूध का बरतन लेकर चल पडा.. चलते चलते आगे एक गाय मरी हुई पडी थी.. पुत्र ने आस-पास से घास को उखाड कर गाय के पास डाल दिया और वहीं पर बैठ गया.. 

दूध का बरतन भी पास ही रख लिया... जब काफी देर हो गयी तो पिता ने सोचा.. पितरों को भोग का समय हो गया है.. पुत्र अभी तक नही आया..तो पिता खुद चल पडे दूध लेने.. 

पिता चले जा रहे थे तो आगे देखा की पुत्र एक मरी हुई गाय के पास बरतन रखे बैठा है... पिता बोले पुत्र तुम दूध लेने नहीं गये .. पुत्र बोला पिताजी ये गाय पहले घास खायेगी तभी तो दूध देगी.. पिता बोले अरे ये गाय तो मरी हुई है ये घास कैसे खायेगी ??

पुत्र बोला पिताजी ये गाय तो आज मरी है.. जब आज मरी गाय घास नहीं खा सकती.. तो आपके 5 वर्ष 10 वर्ष 50 वर्ष 100 वर्ष पहले मरे पितर खीर कैसे खायेंगे...?? !!

जिस अन्न और धन को हम पितरों के नाम पर भरे पेट वालों के लिये बर्बाद करते उसी से हम गरीबों मजबूरों असहायों के हितार्थ सेवा में लगायें तो शायद पितरों के प्रति सच्ची श्रद्धा और उनका सच्चा श्राद्ध हो सके ।

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