🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏🌷
*https://www.facebook.com/DADUVANI*
*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८० =*
*= पादू में ढकू भक्त को उपदेश =*
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विहाणी गोत का माहेश्वरी ढकू भक्त दादूजी का परम भक्त था । उसने दादूजी की बहुत अच्छी सेवा की थी । एक दिन कुछ जिज्ञासा लेकर हाथ जोड़े हुये ढकू भक्त दादूजी महाराज के सामने बैठा था । उसके मन के भाव को दादूजी महाराज जान गये और उसके अधिकारानुसार यह पद बोले -
राम सुख सेवक जाने रे, दूजा दुख कर माने रे ॥टेक॥
और अग्नि की झाला,१ फंद रोप हैं जम जाला ।
सम काल कठिन शर पेखे, ये सिंह रूप सब देखे ॥१॥
विष सागर लहर तरंगा, यहु ऐसा कूप भुवंगा२ ।
भय भीत भयानक भारी, रिपु करवत मीच विचारी ॥२॥
यहु ऐसा रूप छलावा३ , ठग फाँसी हारा आवा ।
सब ऐसा देख विचारे, ये प्राण घात वट पारे४ ॥३॥
ऐसा जन सेवक सोई, मन और न भावे कोई ।
हरि प्रेम मगन रँग राता, दादू राम रमै रस माता ॥४॥
भक्त एक राम को ही सुख स्वरूप समझते हैं और राम से भिन्न को दुःख रूप मानते हैं ।
राम से भिन्न जो कुछ भी है, सो सब अग्नि की ज्वाला१ के समान चिन्ता द्वारा जलाने वाले ही हैं अथवा माया ने यम-जाल बिछाकर जीवों को फँसाने के लिये फँदा रोपा है । राम से भिन्न सबको काल के कठिन बाण के समान देखे अथवा सिंह-रूप देखे ।
जो मन में विषयों की तरंग उठती है, वह विष-समुद्र की लहर के समान है । जैसे सर्पो२ से परिपूर्ण कूप भयंकर होता है, वैसे ही अति भयानक और भयभीत करने वाला यह संसार है । इसे करवत से चीरकर मारने वाले शत्रु के समान समझना चाहिये ।
यह ठग तथा गले में पाश डालने वाला है किन्तु ऐसे छलिया३ के रूप में सामने आता है कि अज्ञानी प्राणी इसे हितकर मान लेते हैं । फिर भी साधकजन भगवान् से भिन्न सबको विचार पूर्वक ऐसा देखते हैं कि ये स्वार्थी प्राणी मार्ग में लूट४ कर मारने वाले प्राणघातक हैं ।
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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८० =*
*= पादू में ढकू भक्त को उपदेश =*
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विहाणी गोत का माहेश्वरी ढकू भक्त दादूजी का परम भक्त था । उसने दादूजी की बहुत अच्छी सेवा की थी । एक दिन कुछ जिज्ञासा लेकर हाथ जोड़े हुये ढकू भक्त दादूजी महाराज के सामने बैठा था । उसके मन के भाव को दादूजी महाराज जान गये और उसके अधिकारानुसार यह पद बोले -
राम सुख सेवक जाने रे, दूजा दुख कर माने रे ॥टेक॥
और अग्नि की झाला,१ फंद रोप हैं जम जाला ।
सम काल कठिन शर पेखे, ये सिंह रूप सब देखे ॥१॥
विष सागर लहर तरंगा, यहु ऐसा कूप भुवंगा२ ।
भय भीत भयानक भारी, रिपु करवत मीच विचारी ॥२॥
यहु ऐसा रूप छलावा३ , ठग फाँसी हारा आवा ।
सब ऐसा देख विचारे, ये प्राण घात वट पारे४ ॥३॥
ऐसा जन सेवक सोई, मन और न भावे कोई ।
हरि प्रेम मगन रँग राता, दादू राम रमै रस माता ॥४॥
भक्त एक राम को ही सुख स्वरूप समझते हैं और राम से भिन्न को दुःख रूप मानते हैं ।
राम से भिन्न जो कुछ भी है, सो सब अग्नि की ज्वाला१ के समान चिन्ता द्वारा जलाने वाले ही हैं अथवा माया ने यम-जाल बिछाकर जीवों को फँसाने के लिये फँदा रोपा है । राम से भिन्न सबको काल के कठिन बाण के समान देखे अथवा सिंह-रूप देखे ।
जो मन में विषयों की तरंग उठती है, वह विष-समुद्र की लहर के समान है । जैसे सर्पो२ से परिपूर्ण कूप भयंकर होता है, वैसे ही अति भयानक और भयभीत करने वाला यह संसार है । इसे करवत से चीरकर मारने वाले शत्रु के समान समझना चाहिये ।
यह ठग तथा गले में पाश डालने वाला है किन्तु ऐसे छलिया३ के रूप में सामने आता है कि अज्ञानी प्राणी इसे हितकर मान लेते हैं । फिर भी साधकजन भगवान् से भिन्न सबको विचार पूर्वक ऐसा देखते हैं कि ये स्वार्थी प्राणी मार्ग में लूट४ कर मारने वाले प्राणघातक हैं ।
जो कोई जन ऐसा निस्पृह भक्त होता है, उसके मन को भगवान् से बिना कोई भी प्रिय नहीं लगता है । वह तो हरि में अनुरक्त रहकर हरि-प्रेम में निमग्न रहता है और प्रेम-रस से मस्त हुआ राम के साथ ही रमण करता है ।
उक्त पद सुनकर ढकू भक्त अत्यन्त प्रभावित हुआ । उसके मन में वैराग्य की लहर उठने लगी फिर उसने अपना जीवन उक्त पद के अर्थ के समान ही बनाने का प्रयत्न आरम्भ कर दिया ।
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इन्हीं दिनों में रियां के ठाकुर साहब माधवदासजी ने सुना कि संत प्रवर दादूजी महाराज आजकल पादू ग्राम की जनता का अपने उपदेशों से कल्याण कर रहे हैं । तब रियां के ठाकुर माधवदासजी की भी इच्छा हुई कि - स्वामी दादूजी महाराज को यहां बुलवाया जाय तो मेरा और मेरी प्रजा का भला ही होगा ।
फिर उन्होंने दादूजी को बुलवाने के लिये अपने कार्यकर्ता मोहनलालजी को बुलवाकर कहा - तुम पादू जाकर दादूजी महाराज को यहां ले आवो । दादूजी को मेरी सस्नेह सत्यराम कहना और मेरी ओर से प्रार्थना करना कि - ठाकुर माधवदास आपको बहुत याद करते हैं फिर मोहनलाल पादू गए और दादूजी को प्रणाम करके ठाकुर की प्रार्थना सुना दी और कहा - मुझे आपको रियां ले आने के लिये ही भेजा है ।
आप ठाकुर साहब तथा रियां की जनता को अपने दर्शन और सत्संग से कृतार्थ करने के लिये अवश्य पधारें । आप तो अन्तर्यामी महान् संत हैं, ठाकुर साहब के मन के भावों को जानते ही हैं । उन्होंने मुझे आग्रह पूर्वक कहा है कि स्वामीजी को लेकर ही आना ।
तब दादूजी ने ठाकुर की प्रीति देखकर स्वीकार कर लिया । फिर भक्त ढाकू को ज्ञात हुआ कि स्वामीजी रियां पधारेंगे । तब उसने हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुये कहा - स्वामिन् ! फिर भी मुझ सेवक पर शीघ्र ही कृपा करना । दादूजी ने कहा ठीक है । ऐसा कह कर रियां को प्रस्थान कर दिया ।
इति श्री दादूचरितामृत विन्दु ८० समाप्तः ।
(क्रमशः)
उक्त पद सुनकर ढकू भक्त अत्यन्त प्रभावित हुआ । उसके मन में वैराग्य की लहर उठने लगी फिर उसने अपना जीवन उक्त पद के अर्थ के समान ही बनाने का प्रयत्न आरम्भ कर दिया ।
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इन्हीं दिनों में रियां के ठाकुर साहब माधवदासजी ने सुना कि संत प्रवर दादूजी महाराज आजकल पादू ग्राम की जनता का अपने उपदेशों से कल्याण कर रहे हैं । तब रियां के ठाकुर माधवदासजी की भी इच्छा हुई कि - स्वामी दादूजी महाराज को यहां बुलवाया जाय तो मेरा और मेरी प्रजा का भला ही होगा ।
फिर उन्होंने दादूजी को बुलवाने के लिये अपने कार्यकर्ता मोहनलालजी को बुलवाकर कहा - तुम पादू जाकर दादूजी महाराज को यहां ले आवो । दादूजी को मेरी सस्नेह सत्यराम कहना और मेरी ओर से प्रार्थना करना कि - ठाकुर माधवदास आपको बहुत याद करते हैं फिर मोहनलाल पादू गए और दादूजी को प्रणाम करके ठाकुर की प्रार्थना सुना दी और कहा - मुझे आपको रियां ले आने के लिये ही भेजा है ।
आप ठाकुर साहब तथा रियां की जनता को अपने दर्शन और सत्संग से कृतार्थ करने के लिये अवश्य पधारें । आप तो अन्तर्यामी महान् संत हैं, ठाकुर साहब के मन के भावों को जानते ही हैं । उन्होंने मुझे आग्रह पूर्वक कहा है कि स्वामीजी को लेकर ही आना ।
तब दादूजी ने ठाकुर की प्रीति देखकर स्वीकार कर लिया । फिर भक्त ढाकू को ज्ञात हुआ कि स्वामीजी रियां पधारेंगे । तब उसने हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुये कहा - स्वामिन् ! फिर भी मुझ सेवक पर शीघ्र ही कृपा करना । दादूजी ने कहा ठीक है । ऐसा कह कर रियां को प्रस्थान कर दिया ।
इति श्री दादूचरितामृत विन्दु ८० समाप्तः ।
(क्रमशः)

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