गुरुवार, 14 जुलाई 2016

=८३=

‪#‎daduji‬
卐 सत्यराम सा 卐
ज्यों जाणों त्यों राखियो, तुम सिर डाली राइ ।
दूजा को देखूं नहीं, दादू अनत न जाइ ॥ 
ज्यों तुम भावै त्यों खुसी, हम राजी उस बात ।
दादू के दिल सिदक सौं, भावै दिन को रात ॥ 
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साभार ~ @Rajnish Gupta 
(((( सरल तथा सज्जन रहो ))))
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निरमल मन जन सो मोहिं पावा।
मोहिं कपट छल छिद्र न भावा।।
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नैमिषारण्य के वन प्रांत में अनेक प्रकार के वृक्षो में दो वृक्ष सन्निकट थे।
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एक सरल-सीधा चंदन का वृक्ष था दूसरा टेढ़ा-मेढ़ा पलाश का वृक्ष था।
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पलाश पर फूल थे। उसकी शोभा से वन भी शोभित था।
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चंदन का स्वभाव अपनी आकृति के अनुसार सरल तथा पलाश का स्वभाव अपनी आकृति के अनुसार वक्र और कुटिल था, पर थे दोनों पड़ोसी व मित्र।
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यद्यपि दोनों भिन्न स्वभाव के थे। परंतु दोनों का जन्म एक ही स्थान पर साथ ही हुआ था। अत: दोनों सखा थे।
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कुठार लेकर एक बार लकड़हारे वन में घुस आए।
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चंदन का वृक्ष सहम गया।
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पलाश उसे भयभीत करते हुए बोला – ‘सीधे वृक्ष को काट दिया जाता है।
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ज्यादा सीधे व सरल रहने का जमाना नहीं है। टेढ़ी उंगली से घी निकलता है।
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देखो सरलता से तुम्हारे ऊपर संकट आ गया। मुझ से सब दूर ही रहते हैं।’
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चंदन का वृक्ष धीरे से बोला – भाई संसार में जन्म लेने वाले सभी का अंतिम समय आता ही है। परंतु दुख है कि तुम से जाने कब मिलना होगा।
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अब चलते हैं। मुझे भूलना मत ईश्वर चाहेगा तो पुन: मिलेंगे। मेरे न रहने का दुख मत करना।
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आशा करता हूं सभी वृक्षों के साथ तुम भी फलते-फूलते रहोगे।’
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लकड़हारों ने आठ-दस प्रहार किए चंदन उनके कुल्हाड़े को सुगंधित करता हुआ सद्गति को प्राप्त हुआ।
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उसकी लकड़ी ऊंचे दाम में बेची गई।
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भगवान की काष्ठ प्रतिमा बनाने वाले ने उसकी बांके बिहारी की मूर्ति बनाकर बेच दी।
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मूर्ति प्रतिष्ठा के अवसर पर यज्ञ-हवन का आयोजन रखा गया। बड़ा उत्सव होने वाला था।
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यज्ञीय समिधा(लकड़ी) की आवश्यकता थी।
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लकड़हारे उसी वन प्रांत में प्रवेश कर उस पलाश को देखने लगा जो कांप रहा था।
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यमदूत आ पहुंचे।
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अपने पड़ोसी चंदन के वृक्ष की अंतिम बातें याद करते हुए पलाश परलोक सिधार गया।
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उसके छोटे-छोटे टुकड़े होकर यज्ञशाला में पहुंचे।
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यज्ञमण्डप अच्छा सजा था। तोरण द्वार बना था।
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वेदज्ञ पंडित जन मंत्रोच्चार कर रहे थे।
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समिधा को पहचान कर काष्टमूर्ति बना चंदन बोला–
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‘आओ मित्र ! ईश्वर की इच्छा बड़ी बलवान है। फिर से तुम्हारा हमारा मिलन हो गया।
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अपने वन के वृक्षों का कुशल मंगल सुनाओ। मुझे वन की बहुत याद आती है।
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मंदिर में पंडित मंत्र पढ़ते हैं और मन में जंगल को याद करता रहता हूं।
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पलाश बोला – ‘देखो, यज्ञमंडप में यज्ञाग्नि प्रज्जवलित हो चुकी है।
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लगता है कुछ ही पल में राख हो जाऊंगा। अब नहीं मिल सकेंगे। मुझे भय लग रहा है।
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चंदन ने कहा – ‘भाई मैं सरल व सीधा था मुझमे परमात्मा ने अपना आवास बनाकर धन्य कर दिया
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तुम्हारे लिए भी मैंने भगवान से प्रार्थना की थी अत: यज्ञीय कार्य में देह त्याग रहे हो।
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अन्यथा दावानल में जल मरते।
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सरलता भगवान को प्रिय है। अगला जन्म मिले तो सरलता, सीधापन मत छोड़ना।
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सज्जन कठिनाई में भी सरलता नहीं छोड़ते जबकि दुष्ट सरलता में भी कठोर हो जाते हैं।
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सरलता में तनाव नहीं रहता। तनाव से बचने का एकमात्र उपाय सरलता पूर्ण जीवन है।
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बाबा तुलसी दास के राम चरितमानस में भगवान ने स्वयं ही कहा है -
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निरमल मन जन सो मोहिं पावा।
मोहिं कपट छल छिद्र न भावा।।
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अचानक पलाश का मुख एक आध्यात्मिक दीप्ति से चमक उठा।
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(((((((((( जय जय श्री राधे ))))))))))
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