🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐सत्यराम सा卐* 🇮🇳🙏🌷
*https://www.facebook.com/DADUVANI*
*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८१ =*
*= रियां ठाकुर माधवदास को उपदेश =*
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पादू से चलकर मोहनलाल के साथ दादूजी महाराज शिष्यों के सहित ब्रह्मचिन्तन करते हुये रियां पधारे तब रियां के नरेश माधवदासजी जनसमुदाय के साथ संकीर्तन करते हुये दादूजी के सामने आकर प्रणामादि करके दादूजी महाराज का बहुत सत्कार किया और दादूजी के दर्शन कर अपने को अति धन्य समझा फिर ग्राम में ले जाकर एकान्त स्थान में ठहराया और संत सेवा का अच्छा प्रबन्ध कर दिया तथा सब संतों की अनुकूलता का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता था ।
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रियां की जनता दादूजी के दर्शन और सत्संग का अच्छा लाभ उठाने लगी । माधवदास संतों का कीर्तन सुनते थे और दर्शन करते थे तब उनके मन में प्रभु-प्रेम प्रकट होता था । एक दिन रियां नरेश दादूजी को सत्यराम प्रणाम करके हाथ जोड़े हुये कुछ जिज्ञासा लेकर दादूजी के सामने बैठे थे । उनके मन के भाव को जानकार दादूजी महाराज उनके अधिकार के अनुसार उपदेश करने को यह पद बोले -
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मेरा मेरा काहे को कीजे रे, जे कुछ संग न आवे ।
अनत करी नै धन धरीला रे, तेऊ तो रीता जावे ॥
माया बंधन अंध न चेते रे, मेर मांहिं लिपटाया ।
ते जाणूं हूं यह विलासौं, अनत विरोधे खाया ॥१॥
आप स्वारथ यह विलूधा रे, आगम मरम न जाणे ।
जम कर माथे बाण धरीला, ते तो मन ना आणे ॥२॥
मन विचारि सारी ते लीजे, तिल मांहीं तन पड़िवा ।
दादू रे तहँ तन ताड़ीजे, जेणे मारग चढिबा ॥३॥
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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८१ =*
*= रियां ठाकुर माधवदास को उपदेश =*
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पादू से चलकर मोहनलाल के साथ दादूजी महाराज शिष्यों के सहित ब्रह्मचिन्तन करते हुये रियां पधारे तब रियां के नरेश माधवदासजी जनसमुदाय के साथ संकीर्तन करते हुये दादूजी के सामने आकर प्रणामादि करके दादूजी महाराज का बहुत सत्कार किया और दादूजी के दर्शन कर अपने को अति धन्य समझा फिर ग्राम में ले जाकर एकान्त स्थान में ठहराया और संत सेवा का अच्छा प्रबन्ध कर दिया तथा सब संतों की अनुकूलता का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता था ।
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रियां की जनता दादूजी के दर्शन और सत्संग का अच्छा लाभ उठाने लगी । माधवदास संतों का कीर्तन सुनते थे और दर्शन करते थे तब उनके मन में प्रभु-प्रेम प्रकट होता था । एक दिन रियां नरेश दादूजी को सत्यराम प्रणाम करके हाथ जोड़े हुये कुछ जिज्ञासा लेकर दादूजी के सामने बैठे थे । उनके मन के भाव को जानकार दादूजी महाराज उनके अधिकार के अनुसार उपदेश करने को यह पद बोले -
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मेरा मेरा काहे को कीजे रे, जे कुछ संग न आवे ।
अनत करी नै धन धरीला रे, तेऊ तो रीता जावे ॥
माया बंधन अंध न चेते रे, मेर मांहिं लिपटाया ।
ते जाणूं हूं यह विलासौं, अनत विरोधे खाया ॥१॥
आप स्वारथ यह विलूधा रे, आगम मरम न जाणे ।
जम कर माथे बाण धरीला, ते तो मन ना आणे ॥२॥
मन विचारि सारी ते लीजे, तिल मांहीं तन पड़िवा ।
दादू रे तहँ तन ताड़ीजे, जेणे मारग चढिबा ॥३॥
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जो कुछ भी संसार में पदार्थ हैं वे प्राणी के साथ तो आते नहीं हैं फिर भी मेरा मेरा क्यों किया जाता है ? जो अहंकार के वश अनीति करके धन संग्रह करते हैं, वे भी तो खाली हाथ ही जाते हैं ।
मदांध प्राणी माया-बन्धन में बँधे हुये ममता में लिप्त हो रहे हैं । विरोध द्वारा दूसरों से धन छीनकर खाते हैं और वे जानते हैं कि - हम आनन्द ले रहे हैं ।
ये लोग अपनी स्वार्थ सिद्धि में लगे हैं किंतु आगे इसका क्या परिणाम होगा, यह रहस्य नहीं जानते हैं । इनके शिर मारने के लिये यम ने अपने हाथ में बाण धारण कर रक्खा है, उसे मन में स्मरण नहीं करते हैं ।
अरे प्राणी ! यह शरीर क्षण भर में नष्ट होने वाला है, जिस मार्ग द्वारा तुझे प्रभु की ओर ऊंचे चढ़ना है, उसी में शरीर को साधन रूप ताड़ना दे और मन में विचार करके परब्रह्म रूप अखण्ड वस्तु को आत्मरूप से ग्रहण कर ।
उक्त उपदेश सुनकर रियां नरेश माधवदासजी को मिथ्या प्रपंच से वैराग्य हो गया और उन्होंने समझ लिया कि ममता मिथ्या है एक अद्वैत ब्रह्म ही सर्वथा सत्य है । वे फिर दादूजी की सादन पद्धति के अनुसार निर्गुण ब्रह्म का भजन करते हुये संसार में जल में कमल के समान रहने लगे ।
(क्रमशः)
जो कुछ भी संसार में पदार्थ हैं वे प्राणी के साथ तो आते नहीं हैं फिर भी मेरा मेरा क्यों किया जाता है ? जो अहंकार के वश अनीति करके धन संग्रह करते हैं, वे भी तो खाली हाथ ही जाते हैं ।
मदांध प्राणी माया-बन्धन में बँधे हुये ममता में लिप्त हो रहे हैं । विरोध द्वारा दूसरों से धन छीनकर खाते हैं और वे जानते हैं कि - हम आनन्द ले रहे हैं ।
ये लोग अपनी स्वार्थ सिद्धि में लगे हैं किंतु आगे इसका क्या परिणाम होगा, यह रहस्य नहीं जानते हैं । इनके शिर मारने के लिये यम ने अपने हाथ में बाण धारण कर रक्खा है, उसे मन में स्मरण नहीं करते हैं ।
अरे प्राणी ! यह शरीर क्षण भर में नष्ट होने वाला है, जिस मार्ग द्वारा तुझे प्रभु की ओर ऊंचे चढ़ना है, उसी में शरीर को साधन रूप ताड़ना दे और मन में विचार करके परब्रह्म रूप अखण्ड वस्तु को आत्मरूप से ग्रहण कर ।
उक्त उपदेश सुनकर रियां नरेश माधवदासजी को मिथ्या प्रपंच से वैराग्य हो गया और उन्होंने समझ लिया कि ममता मिथ्या है एक अद्वैत ब्रह्म ही सर्वथा सत्य है । वे फिर दादूजी की सादन पद्धति के अनुसार निर्गुण ब्रह्म का भजन करते हुये संसार में जल में कमल के समान रहने लगे ।
(क्रमशः)

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