🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका१(ग्रन्थ२) ~ प्रथम उपदेश*
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*केचित् अपर्स्स पाक बनावैं ।*
*मुख मूंदहिं हुन्नर दिखरावैं ॥*
*केचित् जीमत कूटहि थारी ।*
*करि करि ग्रास देइ कर नारी ॥३१॥*
(इसके विपरीत) कुछ पण्डित दूसरे का छुआ भोजन न करने में ही मुक्ति का मार्ग बतलाते हैं । और भोजन करने से पूर्व तरह-तरह से आँख मूँद कर मन्त्र बोलने का ढोंग रचते हैं । उन्हीं में से कुछ पण्डित भोजन करते समय थाली बजाते रहते हैं कि उस समय किसी चाण्डाल का बोला शब्द कान में न पड जाय । (कहते हैं-महाराज श्रीसुन्दरदासजी के समय ऐसी प्रथा दक्षिण देश में थी ।) कुछ पण्डित अपने हाथ से भोजन न करना मोक्ष का सरल उपाय मानते हैं । उन्हें(उनके भक्त या) उनकी स्त्रियाँ अपने हाथ से एक-एक ग्रास खिलाती हैं ॥३१॥
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*केचित् धोवन धावन पीवैं ।*
*रहैं मलीन कहौ क्यौं जीवैं ॥*
*केचित् मता अघोरी लीया ।*
*अंगीकृत दोऊ का कीया ॥३२॥*
कुछ लोग (इससे भी आगे बढकर) भोजन न कर उसको बनाने के लिये काम में आनेवाले बर्तनों को धोकर पीने में अपनी सन्तोष वृति का पाखण्ड दिखाते हैं । कुछ लोग (जैन) एक बार कपडा पहनने के बाद फिर उसे कभी धोते नहीं, काफी मैला-गन्दा होने पर भी उसे पहनने रहते हैं; क्योंकि ये लोग वस्त्र धोने में हिंसा मानते हैं । कैसे इनकी जिन्दगी कटती है, इन्हें गन्दगी से कुछ ग्लानी भी नहीं आती ! इसी तरह गन्दा रहने में ही ये लोग ‘मोक्ष’ समझते हैं । कुछ अघोरी हैं जो एक तरफ वाम मार्ग का अनुसरण कर हिंसा करते हैं, दूसरी तरफ गन्दा रहते हुए जैनों को भी दूर बैठाते हैं ! ॥३२॥
(क्रमशः)
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका१(ग्रन्थ२) ~ प्रथम उपदेश*
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*केचित् अपर्स्स पाक बनावैं ।*
*मुख मूंदहिं हुन्नर दिखरावैं ॥*
*केचित् जीमत कूटहि थारी ।*
*करि करि ग्रास देइ कर नारी ॥३१॥*
(इसके विपरीत) कुछ पण्डित दूसरे का छुआ भोजन न करने में ही मुक्ति का मार्ग बतलाते हैं । और भोजन करने से पूर्व तरह-तरह से आँख मूँद कर मन्त्र बोलने का ढोंग रचते हैं । उन्हीं में से कुछ पण्डित भोजन करते समय थाली बजाते रहते हैं कि उस समय किसी चाण्डाल का बोला शब्द कान में न पड जाय । (कहते हैं-महाराज श्रीसुन्दरदासजी के समय ऐसी प्रथा दक्षिण देश में थी ।) कुछ पण्डित अपने हाथ से भोजन न करना मोक्ष का सरल उपाय मानते हैं । उन्हें(उनके भक्त या) उनकी स्त्रियाँ अपने हाथ से एक-एक ग्रास खिलाती हैं ॥३१॥
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*केचित् धोवन धावन पीवैं ।*
*रहैं मलीन कहौ क्यौं जीवैं ॥*
*केचित् मता अघोरी लीया ।*
*अंगीकृत दोऊ का कीया ॥३२॥*
कुछ लोग (इससे भी आगे बढकर) भोजन न कर उसको बनाने के लिये काम में आनेवाले बर्तनों को धोकर पीने में अपनी सन्तोष वृति का पाखण्ड दिखाते हैं । कुछ लोग (जैन) एक बार कपडा पहनने के बाद फिर उसे कभी धोते नहीं, काफी मैला-गन्दा होने पर भी उसे पहनने रहते हैं; क्योंकि ये लोग वस्त्र धोने में हिंसा मानते हैं । कैसे इनकी जिन्दगी कटती है, इन्हें गन्दगी से कुछ ग्लानी भी नहीं आती ! इसी तरह गन्दा रहने में ही ये लोग ‘मोक्ष’ समझते हैं । कुछ अघोरी हैं जो एक तरफ वाम मार्ग का अनुसरण कर हिंसा करते हैं, दूसरी तरफ गन्दा रहते हुए जैनों को भी दूर बैठाते हैं ! ॥३२॥
(क्रमशः)

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