रविवार, 10 जुलाई 2016

= विन्दु (२)८० =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८० =*
*= रास प्रसंग =*
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कुछ दिन पश्चात् कोटड़ी ग्राम में एक रास मंडली आई । वह मंडली रास अच्छा करती थी । उस रास मंडली की प्रशंसा सुनकर पीथा की भी रास देखने की इच्छा हुई किंतु उसने सोचा रास मंडली को रसोई तथा भेंट भी देना ही चाहिये किंतु अब डाका मारना छोड़ दिया था अतः पास में धन भी नहीं था फिर उसने रास के निमित्त से एक डाका डालने की इच्छा की ।
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एक दिन घींघोली की घाटी में एक श्रीमान् को लूट लिया । जिस सज्जन को लूटा था उस को किसी ने कहा - यह डाकू संत प्रवर दादूजी के पास जाता है और उनकी सब भी बात भी मानता है । तुम दादूजी के पास करड़ाले में जाकर उन से कहो-तो संभव है आपका धन उनके समझाने से पीछा दे दे ।
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वे गये और दादूजी को प्रणाम करके कहा - पीथा निर्वाण ने हमें लूट लिया है । आप उसे समझाकर हमको हमारा माल दिला दें तो हम आपके अति आभारी रहेंगे । दादूजी ने कहा - आप लोग धैर्य करो, मैं उसको बुलवाकर कहता हूँ । फिर दादूजी ने एक व्यक्ति को भेजकर पीथा को बुलवाया ।
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वह आया तब दादूजी ने पीथा को कहा - तुमने तो डाका मारना छोड़ दिया था फिर इन लोगों को कैसे लूटा है ? पीथा ने कहा - इनको मैंने मेरे लिये नहीं लूटा है । रास कराने और देखने के लिये लूटा है । तब दादूजी ने कहा - तुमको सच्चा रास देखना है वा रास की नकल देखना है ?
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पीथा ने कहा - इच्छा तो सच्चा रास देखने की है किन्तु सच्चा रास तो देखना असम्भव है । अतः रास की नकल ही देखकर संतोष करूंगा । तब दादूजी ने कहा - तुम इनका सब माल दे दो, फिर हम तुमको सच्चा रास दिखायेंगे । किन्तु पुनः कपट का काम नहीं करना होगा ।
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ऐसा कहकर यह पद सुनाया -
"बहुरि न कीजे कपट काम,
ह्रदय जपिये राम राम ॥टेक॥
हरि पाखें१ नहिं कहूँ ठाम,
पीव बिन खड़भड़ गांव-गांव ।
तुम राखो जियरा अपनी मांम२,
अनत जनि जाय रहो विश्राम ॥१॥
कपट काम नहिं कीजे हांम३,
रहु चरण कमल रह राम नाम ।
जब अंतरजामी रहै जाम४,
तब अक्षय पद जन दादू प्राम५ ॥२॥
१. बिना । २. ममता । ३. हिम्मत । ४. पहर । ५. प्राप्त ।
इस पद का अनुवाद विन्दु ८४ में 'हाथी को उपदेश' शीर्षक में देखो । दादूजी उक्त वचन सुनकर पीथा ने उन लोगों का सब माल दे दिया । तब दादूजी ने कहा - आज सायंकाल को यहां आ जाना हम तुमको सच्चा रास दिखा देंगे ।
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पीथा सायंकाल दादूजी के पास आ गया । दादूजी उस अकेले को साथ लेकर पर्वत के बीच शिखर पर चढ़ गये और एक शिला पर बैठकर बोले - यहां तुम अब साक्षात् श्री कृष्ण भगवान् को और उनके सच्चे रास को देखो और नकली रास को देखने की इच्छा मन से निकाल दो । वह सच्चा रास घट घट में होता ही रहता है, उसे नित्य रास भी कहते हैं । उसी को तुम - तुम्हारे नेत्रों से यहाँ देख सकोगे ।
(क्रमशः)

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