#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
दादू सबका साहिब एक है, जाका परगट नांव ।
दादू सांई शोध ले, ताकी मैं बलि जांव ॥
साचा सांई शोध कर, साचा राखी भाव ।
दादू साचा नाम ले, साचे मारग आव ॥
==========================
साभार ~ Ramjibhai Jotaniya
राधे राधे..
"गीताप्रेस गोरखपुर परिवार" के ओर से आज का सत्संग :
।। ।। दिनांक : 06-10-2015 ।। मंगलवार ।। ।।
** प्रथम तो मनुष्य का शरीर मिलना कठिन है और यदि मिल जाये तो भी भारतभूमि में जन्म होना, कलियुग में होना तथा वैदिक सनातन धर्म प्राप्त होना दुर्लभ है | इससे भी दुर्लभतर शास्त्रों के तत्व और रहस्य बतलाने वाले पुरुषो का संग है | इसलिये जिन पुरुषो को उपयुक्त संयोग प्राप्त हो गए है, वे यदि परमशांति और परमआनंदायक परमात्मा की प्राप्ति से वंचित रहे तो इससे बढकर उनकी मूढ़ता क्या होगी |
।। श्री जयदयाल जी गोयन्दका सेठजी ।।
** जीवन का परम ध्येय स्थिर हो जाने पर जब उसके अतिरिक्त अन्य सभी लौकिक-परलौकिक पदार्थों के प्रति वैराग्य हो जाता है, तब साधक के हृदय में कुछ दैवी भावों का विकास होता है । उसका अन्त:करण शुद्ध सात्विक बनता जाता है । इन्द्रियाँ वश में हो जाती है, मन विषयों से हट कर परमात्मा में एकाग्र हो जाता है, सुख-दुःख, शीतोष्ण का सहन सहज में ही हो जाता है, संसार के कार्यों से उपरामता होने लगती है, परमात्मा और उसकी प्राप्ति के साधनो में तथा सन्तशास्त्रों की वाणी में परम श्रद्धा हो जाती है, परमात्मा को छोड़ कर दुसरे किसी पदार्थ में मेरी तृप्ति होगी या मुझे परम सुख मिलेगा, यह शंका सर्वथा मिटकर चित का समाधान हो जाता है । फिर उसे एक परमात्मा के सिवा अन्य कुछ भी अच्छा नहीं लगता, उसकी सारी क्रियाए केवल परमात्मा की प्राप्ति के लिए होती है । वह सब कुछ छोड़ कर एक परमात्मा को ही चाहता है ।
।। भाई जी श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार जी ।।
** अन्तिम प्रवचन
(ब्रह्मलीन श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज के आषाढ़ कृष्ण द्वादशी, विक्रम सम्वत-२०६२, तदनुसार ३ जुलाई, २००५ को परमधाम पधारने के पूर्व दिनांक २९-३० जून, २००५ को गीताभवन, स्वर्गाश्रम में दिया गया अन्तिम प्रवचन)
एक बहुत श्रेष्ठ, बड़ी सुगम, बड़ी सरल बात है । वह यह है कि किसी तरह की कोई इच्छा मत रखो । न परमात्मा की, न आत्मा की, न संसार की, न मुक्ति की, न कल्याण की, कुछ भी इच्छा मत करो और चुप हो जाओ । शान्त हो जाओ । कारण कि परमात्मा सब जगह शान्तरूप से परिपूर्ण है । स्वतः-स्वाभाविक सब जगह परिपूर्ण है । कोई इच्छा न रहे, किसी तरह की कोई कामना न रहे तो एकदम परमात्मा की प्राप्ति हो जाय, तत्त्वज्ञान हो जाय, पूर्णता हो जाय !
यह सबका अनुभव है कि कोई इच्छा पूरी होती है, कोई नहीं होती । सब इच्छाएँ पूरी हो जायँ यह नियम नहीं है । इच्छाओं का पूरा करना हमारे वश की बात नहीं है, पर इच्छाओं का त्याग करना हमारे वश की बात है । कोई भी इच्छा, चाहना नहीं रहेगी तो आपकी स्थिति स्वतः परमात्मा में होगी । आपको परमात्मतत्त्व का अनुभव हो जायगा । कुछ चाहना नहीं, कुछ करना नहीं, कहीं जान नहीं, कहीं आना नहीं, कोई अभ्यास नहीं । बस, इतनी ही बात है । इतने में ही पूरी बात हो गयी ! इच्छा करने से ही हम संसार में बँधे हैं । इच्छा सर्वथा छोड़ते ही सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मा में स्वतः-स्वाभाविक स्थिति है ।
प्रत्येक कार्य में तटस्थ रहो । न राग करो, न द्वेष करो ।
तुलसी ममता राम सों, समता सब संसार ।
राग न रोष न दोष दुख, दास भए भव पार ॥
एक क्रिया है और एक पदार्थ है । क्रिया और पदार्थ यह प्रकृति है । क्रिया और पदार्थ दोनों से संबंध-विच्छेद करके एक भगवान् के आश्रित हो जायँ । भगवान् के शरण हो जायँ, बस । उसमें आपकी स्थिति स्वतः है । ‘भूमा अचल शाश्वत अमल सम ठोस है तू सर्वदा’‒ ऐसे परमात्मा में आपकी स्वाभाविक स्थिति है । स्वप्न में एक स्त्रीका बालक खो गया । वह बड़ी व्याकुल हो गयी । पर जब नींद खुली तो देखा कि बालक तो साथ में ही सोया है‒ तात्पर्य है कि जहाँ आप हैं, वहाँ परमात्मा पूरे-के-पूरे विद्यमान है । आप जहाँ हैं, वहीं चुप हो जाओ !!
‒२९ जून २००५, सायं लगभग ४ बजे**** **** ****
श्रोता‒कल आपने बताया कि कोई चाहना न रखे । इच्छा छोड़ना और चुप होना दोनों में कौन ज्यादा फायदा करता है ?
स्वामीजी‒मैं भगवान् का हूँ, भगवान् मेरे हैं, मैं और किसी का नहीं हूँ, और कोई मेरा नहीं है । ऐसा स्वीकार कर लो । इच्छारहित होना और चुप होना‒दोनों बातें एक ही हैं । इच्छा कोई करनी ही नहीं है, भोगों की, न मोक्ष की, न प्रेम की, न भक्ति की, न अन्य किसी की ।
श्रोता‒इच्छा नहीं करनी है, पर कोई काम करना हो तो ?
स्वामीजी‒काम उत्साह से करो, आठों पहर करो, पर कोई इच्छा मत करो । इस बात को ठीक तरह से समझो । दूसरों की सेवा करो, उनका दुःख दूर करो, पर बदले में कुछ चाहो मत । सेवा कर दो और अन्तमें चुप हो जाओ । कहीं नौकरी करो तो वेतन भले ही ले लो, पर इच्छा मत करो ।
सार बात है कि जहाँ आप हैं, वहीं परमात्मा हैं । कोई इच्छा नहीं करोगे तो आपकी स्थिति परमात्मा में ही होगी । जब सब परमात्मा ही हैं तो फिर इच्छा किस की करें ? संसार की इच्छा है, इसलिये हम संसार में हैं । कोई भी इच्छा नहीं है तो हम परमात्मा में हैं ।
‒ ३० जून २००५, दिन में लगभग ११ बजे
‒ ‘एक सन्त की वसीयत’ पुस्तक से
परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदास जी महाराज
(सन्तों के वचनों, उपदेशों के अनुसार अपना जीवन बन जाय‒यही उनके प्रति अपनी सही अर्थ में स्मृति-पुष्पांजलि, कृतज्ञता है । अतः हम सब स्वामीजी महाराज के वचन दृढ़तापूर्वक स्वीकार करके अपना जीवन सफल बनायें )
।। स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज ।।
** अनावश्यक कार्य वही है, जिसका सम्बन्ध वर्तमान से न हो और जिसमें साधक की सामर्थ्य तथा विवेक का समर्थन न हो । जिसका सम्बन्ध वर्तमान से नहीं है और जिसके करने की सामर्थ्य साधक में नहीं है उस कार्य को साधक क्रियात्मक रूप तो दे ही नहीं सकता, केवल उसके करने का राग-मात्र ही साधक में अंकित रहता है, जिसका त्याग करना अनिवार्य है । कभी-कभी असावधानी से साधक विवेक-विरोधी कर्म कर बैठता है, जिसके करने से करने का राग नाश नहीं होता । इस दृष्टि से विवेक-विरोधी कार्य का त्याग भी अत्यन्त आवश्यक है । विवेक-विरोधी कार्य का त्याग करनेपर आवश्यक कार्य को पूरा करने की सामर्थ्य स्वतः प्राप्त होती है । प्राकृतिक विधान की दृष्टि से मिले हुए का सदुपयोग आवश्यक कार्य है । आवश्यक कार्य पूरा करने में असमर्थता की गन्ध भी नहीं है और अनावश्यक कार्य किसी को करना नहीं है । इस दृष्टि से आवश्यक कार्य के अन्त में विश्राम का सम्पादन परम आवश्यक है ।
।। स्वामी शरणानन्द जी महाराज ।।
।। ।। जय श्री कृष्ण ।। ।।
卐 सत्यराम सा 卐
दादू सबका साहिब एक है, जाका परगट नांव ।
दादू सांई शोध ले, ताकी मैं बलि जांव ॥
साचा सांई शोध कर, साचा राखी भाव ।
दादू साचा नाम ले, साचे मारग आव ॥
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साभार ~ Ramjibhai Jotaniya
राधे राधे..
"गीताप्रेस गोरखपुर परिवार" के ओर से आज का सत्संग :
।। ।। दिनांक : 06-10-2015 ।। मंगलवार ।। ।।
** प्रथम तो मनुष्य का शरीर मिलना कठिन है और यदि मिल जाये तो भी भारतभूमि में जन्म होना, कलियुग में होना तथा वैदिक सनातन धर्म प्राप्त होना दुर्लभ है | इससे भी दुर्लभतर शास्त्रों के तत्व और रहस्य बतलाने वाले पुरुषो का संग है | इसलिये जिन पुरुषो को उपयुक्त संयोग प्राप्त हो गए है, वे यदि परमशांति और परमआनंदायक परमात्मा की प्राप्ति से वंचित रहे तो इससे बढकर उनकी मूढ़ता क्या होगी |
।। श्री जयदयाल जी गोयन्दका सेठजी ।।
** जीवन का परम ध्येय स्थिर हो जाने पर जब उसके अतिरिक्त अन्य सभी लौकिक-परलौकिक पदार्थों के प्रति वैराग्य हो जाता है, तब साधक के हृदय में कुछ दैवी भावों का विकास होता है । उसका अन्त:करण शुद्ध सात्विक बनता जाता है । इन्द्रियाँ वश में हो जाती है, मन विषयों से हट कर परमात्मा में एकाग्र हो जाता है, सुख-दुःख, शीतोष्ण का सहन सहज में ही हो जाता है, संसार के कार्यों से उपरामता होने लगती है, परमात्मा और उसकी प्राप्ति के साधनो में तथा सन्तशास्त्रों की वाणी में परम श्रद्धा हो जाती है, परमात्मा को छोड़ कर दुसरे किसी पदार्थ में मेरी तृप्ति होगी या मुझे परम सुख मिलेगा, यह शंका सर्वथा मिटकर चित का समाधान हो जाता है । फिर उसे एक परमात्मा के सिवा अन्य कुछ भी अच्छा नहीं लगता, उसकी सारी क्रियाए केवल परमात्मा की प्राप्ति के लिए होती है । वह सब कुछ छोड़ कर एक परमात्मा को ही चाहता है ।
।। भाई जी श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार जी ।।
** अन्तिम प्रवचन
(ब्रह्मलीन श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज के आषाढ़ कृष्ण द्वादशी, विक्रम सम्वत-२०६२, तदनुसार ३ जुलाई, २००५ को परमधाम पधारने के पूर्व दिनांक २९-३० जून, २००५ को गीताभवन, स्वर्गाश्रम में दिया गया अन्तिम प्रवचन)
एक बहुत श्रेष्ठ, बड़ी सुगम, बड़ी सरल बात है । वह यह है कि किसी तरह की कोई इच्छा मत रखो । न परमात्मा की, न आत्मा की, न संसार की, न मुक्ति की, न कल्याण की, कुछ भी इच्छा मत करो और चुप हो जाओ । शान्त हो जाओ । कारण कि परमात्मा सब जगह शान्तरूप से परिपूर्ण है । स्वतः-स्वाभाविक सब जगह परिपूर्ण है । कोई इच्छा न रहे, किसी तरह की कोई कामना न रहे तो एकदम परमात्मा की प्राप्ति हो जाय, तत्त्वज्ञान हो जाय, पूर्णता हो जाय !
यह सबका अनुभव है कि कोई इच्छा पूरी होती है, कोई नहीं होती । सब इच्छाएँ पूरी हो जायँ यह नियम नहीं है । इच्छाओं का पूरा करना हमारे वश की बात नहीं है, पर इच्छाओं का त्याग करना हमारे वश की बात है । कोई भी इच्छा, चाहना नहीं रहेगी तो आपकी स्थिति स्वतः परमात्मा में होगी । आपको परमात्मतत्त्व का अनुभव हो जायगा । कुछ चाहना नहीं, कुछ करना नहीं, कहीं जान नहीं, कहीं आना नहीं, कोई अभ्यास नहीं । बस, इतनी ही बात है । इतने में ही पूरी बात हो गयी ! इच्छा करने से ही हम संसार में बँधे हैं । इच्छा सर्वथा छोड़ते ही सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मा में स्वतः-स्वाभाविक स्थिति है ।
प्रत्येक कार्य में तटस्थ रहो । न राग करो, न द्वेष करो ।
तुलसी ममता राम सों, समता सब संसार ।
राग न रोष न दोष दुख, दास भए भव पार ॥
एक क्रिया है और एक पदार्थ है । क्रिया और पदार्थ यह प्रकृति है । क्रिया और पदार्थ दोनों से संबंध-विच्छेद करके एक भगवान् के आश्रित हो जायँ । भगवान् के शरण हो जायँ, बस । उसमें आपकी स्थिति स्वतः है । ‘भूमा अचल शाश्वत अमल सम ठोस है तू सर्वदा’‒ ऐसे परमात्मा में आपकी स्वाभाविक स्थिति है । स्वप्न में एक स्त्रीका बालक खो गया । वह बड़ी व्याकुल हो गयी । पर जब नींद खुली तो देखा कि बालक तो साथ में ही सोया है‒ तात्पर्य है कि जहाँ आप हैं, वहाँ परमात्मा पूरे-के-पूरे विद्यमान है । आप जहाँ हैं, वहीं चुप हो जाओ !!
‒२९ जून २००५, सायं लगभग ४ बजे**** **** ****
श्रोता‒कल आपने बताया कि कोई चाहना न रखे । इच्छा छोड़ना और चुप होना दोनों में कौन ज्यादा फायदा करता है ?
स्वामीजी‒मैं भगवान् का हूँ, भगवान् मेरे हैं, मैं और किसी का नहीं हूँ, और कोई मेरा नहीं है । ऐसा स्वीकार कर लो । इच्छारहित होना और चुप होना‒दोनों बातें एक ही हैं । इच्छा कोई करनी ही नहीं है, भोगों की, न मोक्ष की, न प्रेम की, न भक्ति की, न अन्य किसी की ।
श्रोता‒इच्छा नहीं करनी है, पर कोई काम करना हो तो ?
स्वामीजी‒काम उत्साह से करो, आठों पहर करो, पर कोई इच्छा मत करो । इस बात को ठीक तरह से समझो । दूसरों की सेवा करो, उनका दुःख दूर करो, पर बदले में कुछ चाहो मत । सेवा कर दो और अन्तमें चुप हो जाओ । कहीं नौकरी करो तो वेतन भले ही ले लो, पर इच्छा मत करो ।
सार बात है कि जहाँ आप हैं, वहीं परमात्मा हैं । कोई इच्छा नहीं करोगे तो आपकी स्थिति परमात्मा में ही होगी । जब सब परमात्मा ही हैं तो फिर इच्छा किस की करें ? संसार की इच्छा है, इसलिये हम संसार में हैं । कोई भी इच्छा नहीं है तो हम परमात्मा में हैं ।
‒ ३० जून २००५, दिन में लगभग ११ बजे
‒ ‘एक सन्त की वसीयत’ पुस्तक से
परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदास जी महाराज
(सन्तों के वचनों, उपदेशों के अनुसार अपना जीवन बन जाय‒यही उनके प्रति अपनी सही अर्थ में स्मृति-पुष्पांजलि, कृतज्ञता है । अतः हम सब स्वामीजी महाराज के वचन दृढ़तापूर्वक स्वीकार करके अपना जीवन सफल बनायें )
।। स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज ।।
** अनावश्यक कार्य वही है, जिसका सम्बन्ध वर्तमान से न हो और जिसमें साधक की सामर्थ्य तथा विवेक का समर्थन न हो । जिसका सम्बन्ध वर्तमान से नहीं है और जिसके करने की सामर्थ्य साधक में नहीं है उस कार्य को साधक क्रियात्मक रूप तो दे ही नहीं सकता, केवल उसके करने का राग-मात्र ही साधक में अंकित रहता है, जिसका त्याग करना अनिवार्य है । कभी-कभी असावधानी से साधक विवेक-विरोधी कर्म कर बैठता है, जिसके करने से करने का राग नाश नहीं होता । इस दृष्टि से विवेक-विरोधी कार्य का त्याग भी अत्यन्त आवश्यक है । विवेक-विरोधी कार्य का त्याग करनेपर आवश्यक कार्य को पूरा करने की सामर्थ्य स्वतः प्राप्त होती है । प्राकृतिक विधान की दृष्टि से मिले हुए का सदुपयोग आवश्यक कार्य है । आवश्यक कार्य पूरा करने में असमर्थता की गन्ध भी नहीं है और अनावश्यक कार्य किसी को करना नहीं है । इस दृष्टि से आवश्यक कार्य के अन्त में विश्राम का सम्पादन परम आवश्यक है ।
।। स्वामी शरणानन्द जी महाराज ।।
।। ।। जय श्री कृष्ण ।। ।।

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