卐 सत्यराम सा 卐
दादू अवसर चल गया, बरियां गई बिहाइ ।
कर छिटके कहँ पाइये, जन्म अमोलक जाइ ॥
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! यह मनुष्य देह रूपी अवसर कहिये समय, राम भजन के बिना व्यर्थ जा रहा है । अर्थात् अन्तःकरण की वृत्ति बहिर्मुख साधनों में प्रवृत्त होवे, तो फिर आत्म - तत्त्व कैसे प्राप्त हो सकता है ? इसीलिये अज्ञानी मनुष्यों का यह अमूल्य मनुष्य - जीवन वृथा ही जा रहा है ॥
समर्थ का शरणा तजै, गहै आन की औट ।
दादू बलवंत काल की, क्यों कर बंचै चोट ॥
टीका ~ हे जिज्ञासुओं ! सर्वशक्तिमान ईश्वर की शरण को छोड़कर अन्य देवी - देवता आदिकों की ओट ग्रहण करे तो काल की चोट से कैसे रहित हो सकते हैं ? अर्थात् नहीं हो सकते ॥
सुन्दर तो तूं उबरि है, समर्थ शरणै जाइ ।
और जहाँ तहाँ तूं फिरै, काल तहाँ तहाँ खाइ ॥
खोज पकड़ विश्वास गहि, धणी मिलेगा आइ ।
अजा गज मस्तक चढ़ि, निर्भय कोंपल खाइ ॥
दृष्टान्त ~ एक जंगल में, एक रोज रेवड़ से बिछुड़ कर एक बकरी रात को रह गई । उसने सोचा, अब जान कैसे बचेगी ? जंगल में उसने सभी पशुओं के खोज देखे । जब शेर का खोज मिला, उसका सहारा लेकर बैठ गई । जंगल के जानवर निकलने लगे, खाना - पीना करने को । बकरी को देखकर गीदड़ मुंह बाह कर आने लगा । तब बकरी बोली - पहले यहाँ आकर देख ले, यह किसका खोज है ? गीदड़ बोला - शेर का । तो कहा - उसकी बैठाई हुई हूँ, वह मुझे बैठाकर गया है । गीदड़ डर गया । बोला - बहन ! बैठी रह, हम तेरे को कुछ नहीं कहते । इस प्रकार प्रायः सभी जंगल के जानवर देख - देख कर चले गये । जब शेर गर्जना करता हुआ आया, बकरी बोली - मेरी पहले प्रार्थना सुन लो । अब तक तो मैंने आपके खोज का सहारा लेकर अपनी जान बचाई है । अब हे भाई ! आप मुनासिब समझौ, वैसा करो । शेर बोला - ठीक है, अब तुझे किसी का भी खतरा नहीं है । शेर ने हाथी को बुलाया और बोला कि यह मेरी बहन है, इसको तुम अपने ऊपर चढ़ाओ और खूब कच्ची - कच्ची वृक्षों की पत्तियां खिलाओ । उसी प्रकार हाथी करने लगा । बकरी हाथी के मस्तक पर चढ़ कर, सबसे निर्भय होकर, वृक्षों की पत्तियां खाती है, और मग्न रहती है । इसी प्रकार परमेश्वर के नाम रूपी खोज का सहारा लेकर अनन्य भक्त नाम का स्मरण करते हैं । उन्हीं को परमेश्वर, काल - कर्म के भय से मुक्त कर देते हैं ।
(श्री दादूवाणी ~ काल का अंग)
चित्र सौजन्य ~ Vijay Divya Jyoti

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