卐 सत्यराम सा 卐
कहबा सुनबा मन खुशी, करबा औरै खेल ।
बातों तिमिर न भाजई, दीवा बाती तेल ॥
दादू करबे वाले हम नहीं, कहबे को हम शूर ।
कहबा हम थैं निकट है, करबा हम थैं दूर ॥
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साभार ~ Anand Nareliya
एक आदमी ने ईश्वर की बहुत—बहुत प्रार्थना की;ईश्वर प्रसन्न हुआ और ईश्वर ने उसे एक शंख भेंट कर दिया, और कहा—इससे जो तू मांगेगा, मिल जाएगा; जो तू मागेगा, मिल जाएगा। वह आदमी क्षणभर मगेधनी हो गया। जो मागा, मिलने लगा। जब मांगा, तब मिलने लगा। लाख रुपए कहे तो तत्क्षण छप्पर खुला और बरस गए।
अचानक उसके भाग्य में परिवर्तन देखकर दूर—दूर तक खबरें पहुंच गयीं कि कुछ चमत्कार हो रहा है। न वह घर से बाहर जाता है, न कोई श्रम करता है, न कोई व्यवसाय करता है और खजाने खुल गए हैं।
एक संन्यासी उसके घर में आकर मेहमान हुआ। संन्यासी सुबह पूजा कर रहा था। गृहस्थ ने उस संन्यासी को पूजा करते देखा। उस संन्यासी के पास एक बड़ा शंख था। और संन्यासी ने उस शंख से कहा कि मुझे लाख रुपए चाहिए। वह गृहस्थ पीछे खड़ा सुन रहा था। उसने सोचा—अरे, इसके पास भी वैसा ही शंख है! और मुझ से भी बड़ा है! शंख बोला—लाख से क्या होगा, दो लाख ले लो। गृहस्थ के मन में बड़ी लोभ की वृत्ति उठी कि शंख हो तो ऐसा हो! मेरे पास है, लाख मांगता हूं लाख दे देता है, जितना मागो उतना दे देता है—यह भी कोई बात हुए! यह है शंख! लाख कहो, दो लाख कह रहा है! मांगने वाला कहता है—लाख, शंख कहता है—दो लाख ले लो।
पैरों पर गिर पड़ा, संन्यासी के, कहा—आप संन्यासी हैं, आपके लिए ऐसे शंख की क्या जरूरत? मैं गृहस्थ हूं —फिर मेरे पास भी शंख है, वह आप ले लें; वह उतना ही देता है जितना मांगो। आपको वैसे ही जरूरत नहीं
संन्यासी राजी हो गया, शंख बदल लिए गए। संन्यासी उसी सुबह विदा भी हो गया। सांझ पूजा के बाद गृहस्थ ने शंख को कहा—लाख रुपया। शंख ने कहा—लाख में क्या होगा, दो लाख ले लो! गृहस्थ बड़ा प्रसन्न हुआ, कहा—धन्यवाद, तो दो ही लाख सही। शंख ने कहा—दो में क्या होगा, चार ले लो! बस, शंख ऐसा ही कहता चला गया। चार कहा तो कहा—आठ ले लो, और आठ कहा तो कहा—सोलह ले लो। थोड़ी देर में गृहस्थ की तो छाती कंप गयी। देने—लेने की तो कोई बात ही नहीं थी, सिर्फ संख्या दुगुनी हो जाती थी।
अहंकार महाशंख है। तुम मांगो, उससे कई गुना देने को तैयार है—देता कभी नहीं। हाथ कभी कुछ नहीं आता। अहंकार से बड़ा झूठ इस संसार में दूसरा नहीं है। सारी भ्रांतियों का स्रोत है। उससे ही उठती है सारी माया। उससे ही उठता है सारा संसार। संसार को छोड़कर मत भागना—क्योंकि कहा भागोगे, अहंकार तुम्हारे साथ रहेगा। जंहा अहंकार रहेगा, वहा संसार रहेगा। छोड़ना हो कुछ तो अहंकार छोड़ दो। और मजा यह है कि छोड़ना कुछ भी नहीं पड़ता, अहंकार कुछ है ही नहीं, सिर्फ भाव है। सिर्फ मन में पड़ गयी एक गाठ है। धागे उलझ गए हैं और गांठ हो गयी है। धागे सुलझा लो और गांठ खो जाएगी। ऐसा नहीं है कि धागे सुलझाने पर गांठ भी बचेगी, कि जब धागे सुलझ जाएंगे तब गांठ भी हाथ आएगी—गांठ कुछ है ही नहीं।

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