सोमवार, 8 अगस्त 2016

= सर्वंगयोगप्रदीपिका (द्वि.उ. ७/८) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
.
*सर्वांगयोगप्रदीपिका१(ग्रंथ२)*
*भक्तियोग नामक द्वितीय उपदेश*
.
*सार ग्रहै कूकस सब नाखै ।*
*रमिता राम इष्ट सिर राखै ।* 
*आंन देव की करै न सेवा ।*
*पूजै एक निरंजन देवा ॥७॥*
योगी को सन्त-वचनों में सारमात्र ग्रहण कर लेना चाहिये और उसमें से व्यवहार जगत् को लेकर कही हुई अनुपयोगी(कूकस) बातें छोड देनी चाहिये । तथा किसी एक स्थान के प्रति व्यामोह न रखकर साधना के योग्य अन्य स्थानों में भी जाते रहना चाहिये । और निराकार ब्रह्म को छोडकर अन्य किसी साकार देवता के विग्रह की उपासना-पूजा में समय नहीं गँवाना चाहिये ॥७॥ 
.
*मन माहैं सब सौंज सु थापै ।*
*बाहर के बंधन सब कापै ।* 
*सून्य सु मंदिर अधिक अनूपा ।*
*ता महिं मूरति जोति स्वरुपा ॥८॥*
उस ब्रह्मोपासना के लिये भी साधक योगी अपने मानस मन्दिर में ही पूजा स्थान बनाकर वहीं उसके साथ तादात्म्य स्थापित करे । बाह्य जगत् के मिट्टी-पत्थर के बने देवी-देवताओं के विग्रह(मूर्ति) रुपी बन्धनों में उसे न बाँधे । (अर्थात् देवी-देवताओं के इन लौकिक मन्दिरों में जाकर उनकी पूजा में समय बर्बाद न करे ।) इस ब्रह्मोपासना के लिये शून्य(निराकार) मन्दिर ही अधिक उपयुक्त रहेगा । उसमें यदि किसी विग्रह की कल्पना ही करनी है तो ज्योति स्वरुप(प्रकाशमय=तेज:पुंज) विग्रह की कल्पना कर ले ॥८॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें