🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
https://www.facebook.com/DADUVANI
.
*सर्वांगयोगप्रदीपिका१ (ग्रंथ२)*
*भक्तियोग नामक द्वितीय उपदेश*
.
*ज्ञान दीप आरती उतारै ।*
*घण्टा अनहद शब्द विचारै ।*
*तन मन सकल समर्पन करई ।*
*दीन होइ पुनि पायनि परई ॥११॥*
ज्ञानरूपी दीपक से अपने स्वामी की आरती उतारनी चाहिये । अनाहत नाद को घण्टा-ध्वनि के रूप में उनको समर्पित करे । इस तरह उन्हें अपना शरीर और हृदय(मन) समर्पित कर साधक को अत्यन्त दीनता (नम्रता) पूर्वक उनके चरणों की वन्दना करनी चाहिये ॥११॥
.
*मगन होइ नांचै अरु गावै ।*
*गदगद रोमांचित हो आवै ।*
*सेवक भाव कदै नहिं चौरै ।*
*दिन दिन प्रीति अधिक ही जोरै ॥१२॥*
उस भगवान् के प्रेम में विभोर होकर नाचना-गाना चाहिये । साधक उसके ध्यान में इतना तन्मय हो जाय कि वह गद्गद् और रोमांचित हो उठे । कहने का मतलब यह है कि साधक इतनी ऊँची कोटि में पहुँचने पर भी उसके प्रति अपना सेवक भाव न भूले, न कम करे । अपितु उसके दिन-प्रतिदिन के अभ्यास में उसके प्रति अधिक स्नेहभाव बढाता रहे ॥१२॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें