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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८२ =*
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*= कान्हड़जी को पुत्र तथा उपदेश देना =*
रायमलोत ठाकुर अर्जुनसिंह के कामदार कान्हड़जी भूतड़ा माहेश्वरी दादूजी के परम भक्त थे । वे जब सुन पाते कि दादूजी अमुक स्थान में हैं तब दादूजी के दर्शन करने जाया करते थे । एक बार वे दर्शन करने गये तब उदास थे । उन को उदास देखकर दादूजी ने पूछा- उदास क्यों हो ? तब कान्हड़जी ने कहा - गुरुदेव ! पुत्र नहीं होने से मन उदास रहता है ।
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उनकी उक्त बात सुनकर दादूजी महाराज ने कहा - पुत्र तो हो जायगा, परमात्मा का भजन किया करो । फिर कान्हड़जी के दूजनदास पुत्र हुये और दूसरे पुत्र शेषोजी हुये । पहले पुत्र दूजनजी छोटी अवस्था में ही दादूजी के शिष्य हो गये । दूजनजी बाल ब्रह्मचारी ही थे । शेषोजी से कान्हड़जी का आगे वंश चला ।
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जब दादूजी ईडवा में निवास कर रहे थे तब एक दिन प्रातःकाल ही कान्हड़जी भूतड़ा दादूजी के दर्शनार्थ तालाब के तट पर भजन शाल पर पहुँच गये और एक इमली का हरा दांतुन मार्ग में से तोड़ ले गये । दादूजी को सत्यराम बोलकर प्रणाम किया फिर दांतुन चरणों में रख दिया ।
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उसे देखकर दादूजी ने कहा - यह क्या है ? कान्हड़जी ने कहा - यह आपके लिये दांतुन मार्ग इमली का तोड़ लाया हूँ । दादूजी ने कहा - हरे वृक्ष को सताया है ? मेरा राम तो सूखे दांतुन से भी दाँत साफ कर लेता है । आपने यह अच्छा नहीं किया फिर यह साखी बोली -
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"सूखा सहजैं कीजिये, नीला भाने नांहिं ।
काहे को दुःख दीजिये, साहिब है सब मांहिं ॥"
बिना हरा वृक्ष तोड़े ही अनायास सूखे दाँतुन से ही मुख-दाँत साफ करले ना चाहिये । हरे वृक्ष को नहीं तोड़ना चाहिये । परमात्मा आत्मरूप से सब में स्थित हैं अतः परमात्मा के निवास स्थान प्राणियों को क्यों दुःख दिया जाय ?
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अर्थात् किसी को भी दुःख नहीं देना चाहिये । अपना रोम तथा अंग तोड़ने से जैसे हमें दुःख होता है, वैसे ही सब को दुःख होता है । उक्त उपदेश सुन कर कान्हड़जी ने प्रणाम करते हुये कहा - गुरुदेव ! अब आगे आपके उपदेशानुसार ही करूंगा, हरा वृक्ष दांतुन के निमित्त भी नहीं तोडूंगा ।
(क्रमशः)

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