बुधवार, 17 अगस्त 2016

= परिचय का अंग =(४/७-९)

॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥
श्री दादू अनुभव वाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥

**= परिचय का अँग ४ =**

दादू रंग भर खेलूँ पीव सौं, सेती दीन दयाल ।
निश वासर नहिं तहं बसे, मानसरोवर पाल ॥ ७ ॥
शुद्ध मन - मानसरोवर के स्थिरता - बांध पर अर्थात् मन की शुद्ध और स्थिरावस्था में, जहां अज्ञान - रात्रि और इन्द्रिय ज्ञान - दिन नहीं रहता, वहां ही दीन - दयालु परमात्मा के साथ हम बुद्धि - वृत्ति - पिचकारी में ब्रह्मभावना - रँग भरके ब्रह्मानन्द फागोत्सव का खेल खेल रहे हैं ।

दादू रंग भर खेलूँ पीव सौं, तहं कबहुँ न होइ वियोग ।
आदि पुरुष अंतरि मिल्या, कुछ पूरबले सँयोग ॥ ८ ॥
हमारे पूर्वकाल में करे हुये कुछ साधन रूप कर्म - फल का प्राप्ति रूप सँयोग होते ही आदि पुरुष परमात्मा, हमारे शरीर के भीतर हृदय प्रदेश में ही प्राप्त हुये हैं । अष्ट - दल - कमल पर निरँतर भास रहे हैं, कभी भी उनका अन्तर्धान रूप वियोग नहीं होता । वहां ही हम बुद्धि - वृत्ति - पिचकारी में ब्रह्म - विचार - रँग भरकर ब्रह्मानन्द - फागोत्सव - खेल खेल रहे हैं ।

दादू रंग भर खेलूँ पीव सौं, तहं बारह मास वसँत ।
सेवक सदा अनँद है, जुग जुग देखूँ कंत ॥ ९ ॥
जिस पराभक्ति की अवस्था में हम बुद्धि वृत्ति में अखँड ब्रह्माकार रूप रँग भर कर, अभेद भावना रूप प्रेमोत्सव का खेल खेलते हैं, उसमें सँसारी प्राणियों के दो मास की वसँत ॠतु जैसा फागोत्सव नहीं होता किन्तु बारह मास ही वसँत ॠतु जैसा अखँड प्रेमोत्सव होता रहता है और हम भक्त जन वहां निरँतर अपने स्वामी परब्रह्म का साक्षात्कार करते हुये सदा अखँड ब्रह्मानन्द में ही निमग्न रहते हैं ।
(क्रमशः)

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