बुधवार, 17 अगस्त 2016

= विन्दु (२)८२ =

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*#श्रीदादूचरितामृत*, *"श्री दादू चरितामृत(भाग-२)"*
*लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ।*
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*= विन्दु ८२ =*
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*= हेमा को उपदेश =*
एक दिन ईडवा में तालाब तट पर दादूजी विराजे थे । उसी समय ईडवा का हेमा नामक व्यक्ति आया और सत्यराम बोलकर प्रणाम किया फिर हाथ जोड़कर दादूजी के सामने बैठ गया और बोला - स्वामिन् ! मेरे को भी मेरे से हो सके ऐसा साधन कृपा करके बताइये ।
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तब दादूजी यह पद बोलकर उसे उपदेश दिया -
"गोविन्द ! नाम तेरा जीवन मेरा, तारण भव पारा ।
आगे इहिं नाम लागे, संतन आघारा ॥टेक॥
कर विचार तत्त्व सार पूरण धन पाया ।
अखिल नाम अगम ठाम, भाग हमारे आया ॥१॥
भक्ति मूल मुक्ति मूल, भव जल निस्तरना ।
भरम कर्म भंजना भय, किल्विष सब हरना ॥२॥
सकल सिद्धि नव निधि, पूरण सब कामा ।
राम रूप तत्त्व अनूप, दादू निज नामा ॥३॥
नाम महिमा द्वारा नाम साधना बता रहे हैं - हे गोविन्द ! आपका नाम मेरा जीवन है । सांसारिक वासना - सरिता से तार कर संसार से सागर से पार करने वाला है । पूर्वकाल के संत इस नाम के चिन्तन में ही लगे थे । यह आपका नाम ही संतों का आधार है ।
हमने विचार करके ही तत्त्व ज्ञान का भी सार नाम रूप पूर्णधन प्राप्त किया है । नाम ही हमारा सर्वस्व है । नाम ही अगम अगाध रूप परब्रह्म को को प्राप्त कराता है । यह भाग्य वश ही हमारे हृदय में आया है ।
नाम ही भक्ति और मुक्ति का मूल कारण है । संसार सिन्धु के मनोरथ जल से पार करने वाला है । भ्रम, कर्म और भय को नष्ट करने वाला है । संपूर्ण पाप और विकारों को नष्ट करने वाला है ।
संपूर्ण सिद्धियों और नव निधियों को देने वाला है । संपूर्ण कामना पूर्ण करने वाला है और यह राम - नाम निज नाम होने से रामस्वरूप ही है तथा अनुपम तत्त्व है ।
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उक्त नाम महिमा सुनाकर हेमा को कहा - ईश्वर नाम चिन्तन तेरे योग्य साधन है इसे निरंतर किया कर । हेमा ने स्वीकार कर लिया और दादूजी का शिष्य होकर हेमा से हेमदास बन गये । ये सौ शिष्यों में है । फिर ये निरंतर राम नाम का चिन्तन करने लगे और नाम चिन्तन के प्रभाव से अंत में नामी के स्वरूप को प्राप्त हो गये ।
(क्रमशः)


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