बुधवार, 17 अगस्त 2016

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卐 सत्यराम सा 卐
जहँ सेवक तहँ साहिब बैठा, सेवक सेवा मांहि ।
दादू सांई सब करै, कोई जानै नांहि ॥ 
दादू सेवक सांई वश किया, सौंप्या सब परिवार ।
तब साहिब सेवा करै, सेवक के दरबार ॥ 
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साभार ~ Rp Tripathi
** दुःख :: कारण और निवारण ? :: एक संक्षिप्त कथात्मक परिचर्चा **

सम्मानित मित्रो बहुत समय पहले की बात है कि :-- 
एक गाँव में एक धोबी रहता था ; जो ग्रामवासियों के कपडे बीस-वर्ष से प्रतिदिन ; गाँव के पास में बह रही एक नदी से धोकर लाता था ।। और उससे मिले पैंसों से ; अपने घर-परिवार का भरण-पोषण करता था !! परन्तु इसके साथ वह पिछले बीस वर्ष से एक कार्य और नियमित करता था कि :-- वह अपनी गर्दन दर्द के लिए ; एक वैद्य से दवा भी लेता था ; जिसकी मात्रा भी समय के साथ बढ़ती जा रही थी !!

परन्तु मित्रो ; 
वह वैद्य जिसकी वह प्रतिदिन दवाई खाता था ; परम दयालु था !! वह वैद्य पिछले बीस-वर्ष से उस धोबी को सलाह दे रहा था कि :-- तुम्हें मेरी इस दवा को खाने की आवश्यकता नहीं है ; यदि तुम मेरी एक सलाह मान लो ? 

और वह सलाह थी कि :-- 
तुम जिन गंदे कपड़ों की पोटली बना कर ; गधे पर बैठकर नदी ले जाते हो ; और फिर नदी में उन्हें धोकर-सुखाकर ; साफ़ कपड़ों की पोटली बना कर ; पुनः गधे पर बैठकर लाते हो ; उस पोटली को भी दोनों समय ; अपनी गर्दन पर नहीं ; वरन गधे पर ही रख लिया करो !! क्योंकि जब तुम गधे पर बैठे हो ; तो तुम्हारा पोटली सहित सम्पूर्ण भार ; गधा ही उठा रहा है !! 

परन्तु मित्रो ; 
पिछले बीस बर्षों से वह धोबी भी ; उस वैद्य को एक अजीबो-गरीब तर्क देता था ; और वैद्य की बात नहीं मानता था !! उसका तर्क था कि :-- यह ठीक है कि गधा मेरा बोझ उठा रहा है ; परन्तु भगवान ने मुझे भी हाँथ-पैर दिए हैं ; अतः मेरा भी कर्तव्य बनता है कि मैं भी गधे का कुछ बोझ हल्का करूँ !! 

सम्मानित मित्रो ; 
कहीं यह ऊपरी कथानक हम पर भी चरितार्थ तो नहीं हो रहा ?

क्योंकि सिर्फ हमें ही नहीं ? हमारे परिवार को नहीं ? वरन इस संसार की सम्पूर्ण सृष्टि के प्राणियों को जिन्दा रहने के लिए ; प्राण-वायु परमात्मा ही दे रहा है !! अर्थात ; इस सम्पूर्ण सृष्टि का पूर्ण भार ; वह परमात्मा ही उठा रहा है ; और हम धोबी की तरह मंद-बुद्धि बन ; अर्थात अहंकार के वशीभूत हो ; अपना पूर्ण परिश्रम करने के बाद भी मूर्खता-वश ; प्रतिदिन दुखी भी हो रहे हैं ? 

क्या परिश्रम करने के बाद भी ; हमारा दुखी रहना उचित है सम्मानित मित्रो ? 

क्यों ना हम भी परमात्मा कृष्ण रुपी वैद्य की ; चित्र में अंकित सलाह को मान ; सिर्फ अपने-अपने दायित्वों को शांति-पूर्वक ; अर्थात वगैर दुखी होकर निबाहें ? और अपने कर्म के परिणाम को ; परमात्मा की मर्जी पर छोड़ ; अहंकार से उत्पन्न दुःख से ; सदैव के लिए मुक्ति पा ; निश्चिन्त ; खुशहाल ; आमोद-प्रमोद-मय और माधुर्यता से परिपूर्ण ; जीवन बिताएं ?

क्या उपरोक्त से सहमत हैं सम्मानित मित्रो ? 

******** ॐ कृष्णम् वन्दे जगत गुरुम *******

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