🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*सर्वांगयोगप्रदीपिका१(ग्रन्थ२)*
*भक्तियोग नामक द्वितीय उपदेश*
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*माया मोह करै नहिं काहू ।*
*रहै सबनि सौं बेपरवाहू ।*
*कनक कामिनी छाडै संगा ।*
*आशा तृष्णा करै न अंगा ॥३॥*
किसी भी विषय-वस्तु में माया-मोह (ममत्व) न रखे । इन सबके प्रति पूर्णत: उपेक्षाभाव रखे । अर्थात् जो मिले उसका सहधारणत: उपभोग कर लिया, अन्यथा उसके लिये लालसा नहीं करनी चाहिये । सोना-चांदी, व परायी स्त्री का संग कभी न करे, सांसारिक विषयों के प्रति ‘ये मुझे प्राप्त होंगे’ ऐसी आशा या तृष्णा को मन में न आने दे ॥३॥
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*शील सन्तोष क्षमा उर धारै ।*
*धीरज सहित दया प्रतिपारै ।*
*दीन गरीबी राखै पासा ।*
*देखै निरपख भया तमासा ॥४॥*
जिज्ञासु को सच्चरित्रता, सन्तोष, क्षमा, धैर्य, दया(करुणा) आदि गुणों को धारण करते हुए इनका निरन्तर अभ्यास बढाते रहना चाहिये । दूसरों के प्रति हमेशा अपना व्यवहार दीनता का, सीधेपन का रखना चाहिये, अभिमान का नहीं । निष्पक्ष होकर दुनिया के व्यवहार का खेल देखता रहे, किसी का पक्ष ग्रहण न करे ॥४॥
(क्रमशः)

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