शनिवार, 6 अगस्त 2016

=११३=

卐 सत्यराम सा 卐
दादू सिरजनहार के, केते नाम अनन्त ।
चित आवै सो लीजिये, यों साधु सुमरैं संत ॥ 
दादू जिन प्राण पिण्ड हमकौ दिया, अंतर सेवैं ताहि ।
जे आवै ओसण सिर, सोई नांव संवाहि ॥
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साभार ~ Rp Tripathi
** नानक दुखिया सब संसारा : सुखिया केवल नाम अधारा :: एक विवेचना ** 
सम्मानित मित्रो ; 
जब संत नानक कहते हैं कि :-- नानक दुखिया सब संसारा ; सुखिया केवल नाम अधारा !! हे नानक ! यह सम्पूर्ण संसार दुखी है ; सुखी तो केवल वह है जो नाम के आधार के साथ है !! तो इसका अभिप्राय क्या है ? किस तरह उनके बताये गए इस एक सूत्र से ही हम ; सदैव के लिए सुखी हो सकते हैं ? आइये इस आलेख में हम इसकी संक्षिप्त चर्चा करें !! 

मित्रो संत नानक जी की इस सूक्ति का अर्थ जो मैं समझ पाया हूँ वह है :-- 
हम अपनी दृष्टि ; सिर्फ नाम तक ही सीमित ना रखें ; वरन नाम के आधार तक भी अपनी दृष्टि ले जाएँ !! 

क्योंकि ; 
नाम तो रूप के अनुसार परिवर्तनशील है ; परन्तु नाम का आधार ; सदैव अपरिवर्तनशील है !! अर्थात हम परिवर्तन-शील और अपरिवर्तन-शील को एक साथ देखने की दृष्टि विकसित करें ; एक स्वर्णकार की तरह !! 

अतः उनके अनुसार :-- 
यदि हमने इस दृश्य जगत को ; स्वर्णकार की तरह आधार सहित देखने की दृष्टि विकसित नहीं की ? तो जीवन में कभी सुखी नहीं हो सकते ; और यदि विकसित कर ली है ? तो कभी दुखी नहीं हो सकते !! 

आइये हम व्योहारिक जगत में ; स्वर्णकार की इस दृष्टि की ; संक्षिप्त विवेचना करें :-- 

मित्रो ; जब स्वर्ण-कार सोने का कोई आभूषण या मूर्ति बनाता है ; तो वह रूप के अनुसार ; उन्हें अलग-अलग नाम अवश्य दे देता है ; जो व्योहारिक उपयोगिता के लिए परमावश्यक हैं ; परन्तु वह आभूषणों/मूर्तियों को हमेशा उनके आधार स्वर्ण सहित देखता है ; जिससे वह किसी भी आभूषण/मूर्ति से आंतरिक राग-द्वेष नहीं रखता !! 

अर्थात वह राम के चरित्र के कारण उनका उपासक होते हुए भी ; ना वह राम की मूर्ति से राग करता है ; और ना ही रावण की मूर्ति से आंतरिक द्वेष !! अर्थात ; बाह-व्योहार में विवेक की भिन्नता होते हुए भी स्वर्णकार का ह्रदय ; सदैव राग-द्वेष से मुक्त रहता है !! 

इसी तरह सम्मानित मित्रो ; 
जब हम इस सम्पूर्ण परिवर्तनशील जड़-चैतन्य-मय-भौतिक-दृश्य-जगत को ; उसके अपरिवर्तन-शील-आधार ; परमात्मा के सहित देंखने की दृष्टि विकसित करते हैं ; तो हम सदैव सुखी रहते हैं !! 

परिवर्तनशील का दर्शन ; 
सांसारिक-व्योहार के लिए परमावश्यक है !! और अपरिवर्तनशील का दर्शन ; व्योहार को राग-द्वेष-अहंकार से मुक्त रख ; विवेक/मर्यादा-युक्त व्योहार करने के लिए !! अर्थात ; यदि हम दर्शन में समता रखें ; परन्तु व्योहार में विवेक की भिन्नता रखें ? तो सदैव सुखी रहेंगे !! 

उपरोक्त विवेचन से सहमत हैं ना सम्मानित मित्रो ? 

******** ॐ कृष्णम् वन्दे जगत गुरुम ********

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