सोमवार, 29 अगस्त 2016

= विन्दु (२)८४ =

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॥ दादूराम सत्यराम ॥
**श्री दादू चरितामृत(भाग-२)** लेखक ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥

**= अथ विन्दु ८४ =** 

**= रायसिंह के प्रश्नोत्तर =**
रायसिंह ने पूछा - तुम्हारा धर्म कौन सा है ? व्यवहार कैसा है ? कर्तव्य क्या है ? और कथनी क्या है ? दादूजी ने कहा - राम नाम का चिन्तन करना ही हमारा धर्म । पांचों ज्ञानेन्द्रियों को जीतने का यत्न करना ही हमारा व्यवहार है । जो पूर्वकाल के संतों ने किया है, वही हमारा कर्तव्य है और कथन हमारा सबके प्रति यही है कि - सब अपने मन की वृत्ति को निरंजन राम के स्वरूप में लीन करो । फिर राजा ने पूछा तुम्हारा पंथ कौन सा है ? और तुम किस देव की पूजा करते हो ? तब परम संत दादूदयालुजी ने यह पद कहा - 
"मैं पंथी एक अपार का, मन और न भावे । 
सोइ पंथ पावे पीव का, जिसे आप लखावे ॥ टेक ॥ 
को पंथ हिन्दू तुरक के, को काहूँ राता । 
को पंथ सोफी सेवड़े, को संन्यासी माता ॥ १ ॥ 
को पंथ जोगी जंगमा, को शक्ति पंथ ध्यावें । 
को पंथ कमड़े कापड़ी, को बहुत मनावें ॥ २ ॥ 
को पंथ काहूं के चले, मैं और न जानूं । 
दादू जिन जग सिरजिया, ता ही को मानूं ॥ ३ ॥"
अपने मार्ग का निर्णय करके दिखा रहे हैं - हम तो अद्वैत, अपार, परब्रह्म की प्राप्ति के साधन रूप मार्ग में चल रहे हैं, हमारे मन को अन्य कोई भी अच्छा नहीं लगता है । उस प्रभु की प्राप्ति का मार्ग, वही प्राप्त कर सकता है, जिसे प्रभु स्वयं ही दिखाते हैं । नहीं तो - कोई हिन्दू और कोई तुरकों के पंथ में चलता है । कोई अन्य किसी में अनुरक्त है । कोई सूफी, कोई सेवड़े कोई संन्यासियों के पंथ में मस्त रहता है । कोई योगी, कोई जंगम और कोई शक्ति पंथ की उपासना करता है । कोई चमार साधु कामड़ों के और कोई नाना कपड़ों की गुदड़ी रखने वाले अघोरियों के पंथ में चलता है । कोई बहुतों को मानता है । कोई किसी के भी पंथ में चले किन्तु हम तो अन्य को हितकर न जानकर जिसने संसार की रचना की है, उस प्रभु की प्राप्ति के मार्ग को ही अपने कल्याण का साधन मानते हैं । राजा ने फिर कहा - उस पंथ का स्वरूप क्या है ? 
(क्रमशः)

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